रिपोर्ट @शम्भूनाथ सोनी
मिश्रा परिवार में कथा में बह रही ज्ञान गंगा की रस धारा
बिरसिंहपुर पाली ---निस्वार्थ प्रेम, भगवान शरणागत वत्सलता और आत्मा के परमात्मा में विलीन होने के अंतिम संदेश को दर्शाते हुए श्री वेद व्यास नंदन सुखदेव जी ने कथा समापन पर परीक्षित जी को बतलाते हुए कहा कि विपत्ति में भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए, चूंकि धर्म ही सदैव प्राणी के साथ रहता है, धर्मस्य कर्म ही हर क्षण प्राणी को शांति प्रदान करती है । आज के कथा में मुख्य रूप से रति और कामदेव के जन्म की बात करते हुए बतलाया की भगवान भूत भावन के शाप के कारण कामदेव जी भस्म हो गयें थे, तब रति देवी के प्रार्थना पर प्रसन्न होकर महादेव जी ने बतलाया की व्दापर युग में कृष्ण के तनय के रूप में आपके पति श्री कृष्ण के पुत्र होगें, उसी के कारण रूकमणी के गर्भ से कृष्ण तनय बनकर प्रद्युम्न जन्म लिया लेकिन शम्बासुर ने प्रद्युम्न को सूतिका गृह से हरण कर जन्म के छठवें दिवस प्रद्युम्न को समुद्र में फेंक देने पर मछली ने सीधे प्रद्युम्न को निगल गयी। उस मछली को पकड़ कर मछुआरे ने उस मछली को पकडकर राजा शम्बासुर के रसोई घर में भेंज दिया गया, उस मछली को काटने पर प्रद्युम्न ने बालक के रूप में निकल आया। शम्बासुर की दासी मायावती ने उस बालक का लालन पालन करते हुए शिक्षा देकर निपुण्य बना दिया, और सोलह वर्ष पूरे होने पर शम्बासुर का वध कर व्दारिका आ गयें, और व्दारिकाधीश मे मंगल छा गये।
राजा परीक्षित ने वेद व्यास नंदन सुखदेव जी से भगवान का एक नाम दीन बन्धु है, आखिर कार यह नाम कैसे पडा, लोक कल्याण की भावना से भरा कौतूहल भरा प्रश्न का जबाब देते हुए सुखदेव जी ने बतलाया की गुजरात प्रदेश में स्थित सुदामा पुरी जो वर्तमान में पोरबंदर के नाम से जाना जाता है, वहा पर सुदामा नामक एक बाम्हण जो अत्यंत गरीब थे, जिनकी एक कुटिया में निवास रत थे उनकी पत्नी सुशीला और बच्चों के साथ भगवान के भक्ति में लीन रहते थे। सुदामा जी भगवान के बाल सखा होने के साथ उज्जैन में संदीपनी जी के यहाँ साथ ही गुरूकुल में एक साथ ही शिक्षा अर्जित किया था। जिस पर भगवान ने कृपा करते हुए उन्हें समृद्ध शाली बना कर झोपड़ी की जगह महल बनाते हुए पूरे नगर को सुदामा पुरी को भी व्दारिका पुरी के समान बना दिया । इस तरह सुदामा को अपनी भक्ति और वैराग्य देकर भगवान ने अपने दीनबंधु का नाम यर्थाथ कर लिया। तत्पश्चात कल्कि अवतार की कथा का वर्णन करते हुए इस मोक्ष दायनी कथा को जन जन के ह्दय में श्रमित करते हुए भक्ति गंगा की अविरल कथा का जीवन में सरिस सरिता बहा दिया।


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