रिपोर्ट @मिर्जा अफसार बेग
वेंकटनगर में नर्मदा एक्सप्रेस के ठहराव की बहाली को लेकर राजनीतिक श्रेय की होड़, लेकिन जनता पूछ रही—बड़ी रेल जरूरतों का क्या हुआ?
शहडोल। शहडोल संसदीय क्षेत्र में रेल सुविधाओं को लेकर आम जनता की उम्मीदें अब छोटे-छोटे ठहराव और प्रतीकात्मक उपलब्धियों से कहीं आगे निकल चुकी हैं। वेंकटनगर रेलवे स्टेशन पर नर्मदा एक्सप्रेस के ठहराव की बहाली को सांसद हिमाद्री सिंह के प्रयासों की बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, लेकिन क्षेत्र की जमीनी तस्वीर कुछ अलग ही कहानी बयां करती नजर आ रही है।
वेंकटनगर में ट्रेन के ठहराव को लेकर आयोजित कार्यक्रमों और राजनीतिक श्रेय लेने की कवायद के बीच क्षेत्रवासियों के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या पहले से बंद ट्रेन स्टॉपेज को दोबारा शुरू करवाना ही क्षेत्र के लिए सबसे बड़ी रेल उपलब्धि है? जनता का कहना है कि ठहराव की बहाली निश्चित रूप से यात्रियों के लिए उपयोगी है, लेकिन शहडोल संभाग की वर्षों पुरानी और बड़ी रेल जरूरतों के मुकाबले इसे निर्णायक उपलब्धि मानना जल्दबाजी होगी।
छोटी राहत नहीं, अब बड़ी रेल कनेक्टिविटी की मांग
क्षेत्रवासियों का कहना है कि शहडोल संसदीय क्षेत्र में रेल सुविधाओं का विस्तार केवल कुछ स्टेशनों पर ठहराव बढ़ाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। अब आवश्यकता ऐसी रेल सेवाओं की है, जो अनूपपुर, कोतमा, बिजुरी और पूरे कोयलांचल क्षेत्र के हजारों लोगों की स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और व्यापार संबंधी जरूरतों को सीधे पूरा कर सकें।
इसी क्रम में नागपुर से शहडोल तक संचालित ट्रेन के विस्तार की मांग लगातार जोर पकड़ रही है। क्षेत्रवासियों की मांग है कि इस ट्रेन को अनूपपुर, कोतमा और बिजुरी तक विस्तारित किया जाए, ताकि इन क्षेत्रों के लोगों को नागपुर जैसे बड़े चिकित्सा एवं व्यावसायिक केंद्र से बेहतर रेल संपर्क मिल सके।
जनता का तर्क है कि अनूपपुर तक ट्रेन का विस्तार होने से बिजुरी, कोतमा और आसपास के क्षेत्रों के हजारों यात्रियों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा। विशेषकर गंभीर बीमारियों और बेहतर चिकित्सा सुविधाओं की तलाश में नागपुर जाने वाले मरीजों एवं उनके परिजनों के लिए यह सुविधा काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
अंबिकापुर-नागपुर ट्रेन की उम्मीद भी अधूरी
क्षेत्रवासियों के बीच अंबिकापुर से नागपुर के बीच नई ट्रेन के संचालन की मांग भी लंबे समय से चर्चा में रही है। यदि नई ट्रेन का संचालन तत्काल संभव नहीं है, तो जनता का सुझाव है कि मौजूदा रेल सेवाओं के मार्ग का विस्तार करते हुए उन्हें कम से कम दो स्टेशन आगे बढ़ाकर अनूपपुर तक जोड़ा जाए।
लोगों का कहना है कि रेल नेटवर्क का विस्तार केवल कागजों और घोषणाओं तक सीमित न रहकर यात्रियों की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप होना चाहिए। खासकर ऐसे क्षेत्र में, जहां बड़ी संख्या में लोग उपचार, रोजगार और अन्य जरूरी कार्यों के लिए दूसरे शहरों की यात्रा करते हैं, वहां बेहतर रेल कनेक्टिविटी किसी राजनीतिक उपलब्धि से अधिक जनजीवन की आवश्यकता है।
राजनीतिक श्रेय बनाम जनता की प्राथमिकताएं
वेंकटनगर में नर्मदा एक्सप्रेस के ठहराव की बहाली को लेकर भाजपा नेताओं द्वारा सांसद के प्रयासों को उपलब्धि के रूप में रेखांकित किया जा रहा है। अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष रामलाल रौतेल और भाजपा जिलाध्यक्ष हीरा सिंह श्याम सहित पार्टी नेताओं की ओर से इसे लेकर राजनीतिक बयान भी सामने आए हैं।
हालांकि, दूसरी ओर जनता का एक वर्ग इस पूरे घटनाक्रम को अलग नजरिए से देख रहा है। क्षेत्रवासियों का कहना है कि राजनीतिक श्रेय की बहस से ज्यादा जरूरी यह है कि शहडोल संभाग की वर्षों पुरानी रेल मांगों का स्थायी समाधान कब होगा।
जनता यह भी सवाल उठा रही है कि जब क्षेत्र को नई ट्रेनों, लंबी दूरी की कनेक्टिविटी, मौजूदा ट्रेनों के विस्तार और महत्वपूर्ण स्टेशनों पर अतिरिक्त ठहराव जैसी बुनियादी जरूरतों का इंतजार है, तब केवल एक बहाल किए गए स्टॉपेज को लेकर बड़े स्तर पर उपलब्धि का प्रचार कितना सार्थक है?
सांसद से अब बड़ी पहल की अपेक्षा
शहडोल संसदीय क्षेत्र की जनता का संदेश अब स्पष्ट दिखाई देता है—उन्हें प्रतीकात्मक उपलब्धियों से ज्यादा ठोस और दूरगामी रेल सुविधाएं चाहिए।
वेंकटनगर में नर्मदा एक्सप्रेस का ठहराव यात्रियों के लिए निश्चित रूप से राहत की बात है, लेकिन जनता की नजर अब इससे आगे है। अनूपपुर, कोतमा और बिजुरी तक बेहतर रेल कनेक्टिविटी, नागपुर से सीधा संपर्क, नई ट्रेनों का संचालन और मौजूदा ट्रेनों का विस्तार जैसे मुद्दे ही आने वाले समय में सांसद के प्रयासों की वास्तविक कसौटी बन सकते हैं।
ऐसे में सवाल केवल इतना नहीं है कि एक ट्रेन का ठहराव वापस आया या नहीं, बल्कि बड़ा सवाल यह है कि शहडोल संसदीय क्षेत्र को वह रेल नेटवर्क कब मिलेगा, जिसकी जरूरत यहां की आबादी वर्षों से महसूस कर रही है।
जनता अब जश्न से ज्यादा परिणाम चाहती है और छोटे पड़ावों से आगे बढ़कर बड़ी रेल मंजिल की उम्मीद लगाए बैठी है।



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