रिपोर्ट @शम्भूनाथ सोनी
बांधवगढ़ के सैर-सपाटे की रही योजना
उमरिया --- भ्रष्टाचार की दलदल में धंसा वन विकास निगम आज फर्जी पौधरोपण, सागौन-सरई की अवैध कटाई, जंगलों से पत्थरों की बेजा खुदाई और खाद घोटाले का पर्याय बन चुका है। आरोप है कि इस लूट की जड़ें प्रदेश से संभाग तक बैठे आला अधिकारियों तक फैली हैं, जो जिले के अधिकारियों से वसूली कर उन्हें खुली छूट दे रहे हैं, और इसी का नतीजा है कि एमडी मनोज अग्रवाल का बहुचर्चित उमरिया दौरा एक घंटे की खानापूर्ति बनकर रह गया।
बताया जाता है कि ताला-बांधवगढ़ में आवभगत के बाद एमडी साहब उमरिया पहुंचे, नौरोजाबाद और हरवाह का एक घंटे में चक्कर लगाया और सब कुछ ठीक है का सर्टिफिकेट देकर रवाना हो गए। न कोई समीक्षा, न कोई फाइल पलटी, न कोई जमीनी पड़ताल। सवाल लाजिमी है कि जब पूरे मंडल में अवैध आरा मशीनों, फर्नीचर कारखानों और चोरी की लकड़ी से पटिया सप्लाई के आरोप लग रहे हैं, तब एमडी को आल इज वेल कैसे दिख गया?
इस चुप्पी के पीछे सबसे बड़ा खेल कोल इंडिया के वृक्षारोपण की फाइल बताई जा रही है। महारत्न कंपनी कोल इंडिया की आनुषंगिक कंपनी एसईसीएल में वृक्षारोपण का जिम्मा वन विकास निगम के पास है। हर साल करोड़ों के अनुबंध, कागजों पर लाखों पौधे, सुरक्षा-खाद-सिंचाई के नाम पर भुगतान, लेकिन हकीकत में मैदान खाली। आज तक कभी समीक्षा ही नहीं हुई कि अनुबंध में कितने पौधे लगाने थे और आज कितने जिंदा हैं। सूत्रों का कहना है कि खदानों के आसपास हरियाली के नाम पर आया पैसा फाइलों में ही पौधा बनकर लहलहा रहा है।
आरोप तो यहां तक है कि रेंजर-डिप्टी रेंजर को पोस्टिंग बचाने के लिए ऊपर का चढ़ावा देना पड़ता है, इसलिए अवैध कटाई और पत्थर खुदाई को रोकने के बजाय प्रश्रय देना उनकी मजबूरी बन गई है। कागजों पर पौधों को जिंदा दिखाने के लिए खरीदी गई एक ट्रक खाद का आज तक अता-पता नहीं है। एक समय सरई-सागौन से भरे निगम के जंगल आज ठूंठों में बदल गए हैं, जब शोर ज्यादा होता है तो एक-दो टहनियों की जब्ती दिखाकर कार्रवाई की औपचारिकता पूरी कर दी जाती है।
और सबसे अहम चर्चा यह भी रही कि अधिकांश वरिष्ठ अधिकारी उमरिया जिले के दौरे के बहाने शासकीय व्यय पर बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान का लुत्फ उठाने की रणनीति बनाकर सरकारी दौरे बनाते हैं और मुफ्त की जंगल सफारी, रिसॉर्ट में आवभगत कर फिर एक घंटे में मंडल निपटाकर वापसी कर जाते हैं, वर्तमान में यही नया प्रोटोकॉल बन गया है। यदि यही रफ्तार रही तो वह दिन दूर नहीं जब वन विकास निगम के जंगल सिर्फ फाइलों में और एसईसीएल का वृक्षारोपण सिर्फ कागजों पर हरा-भरा नजर आएगा।


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