रिपोर्ट @मिर्जा अफसार बेग
छात्राओं की राशि गबन के आरोपों में घिरीं अधिकारी को मिली हाईकोर्ट से राहत, 23 दिन तक क्यों दबा रहा एफआईआर का आदेश?
उमरिया। जिले की प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। मामला ऐसा है, जिसमें कलेक्टर के न्यायालय से प्राथमिकी दर्ज कराने का स्पष्ट आदेश जारी होने के बावजूद कथित तौर पर 23 दिनों तक पुलिस तक मामला नहीं पहुंचा। इसी बीच संबंधित अधिकारी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और कलेक्टर के आदेश पर स्थगन प्राप्त कर लिया। अब प्रशासनिक गलियारों में सवाल उठ रहा है कि जब जिले के सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी के आदेश का ही समय पर पालन नहीं हुआ, तो आम नागरिकों की शिकायतों का क्या हश्र होता होगा?
मामला पाली विकासखंड में कक्षा 9वीं से 12वीं तक अध्ययनरत आदिवासी छात्राओं के लिए शासन से आवंटित राशि से जुड़ा है। आरोप है कि सत्र 2025-26 के दौरान तत्कालीन खंड शिक्षा अधिकारी सरिता जैन ने छात्राओं की यूनिफॉर्म, पठन-पाठन सामग्री, चादर, तकिया, गद्दे और कंबल आदि के लिए उनके बैंक खातों में भेजी गई राशि को अपने स्तर पर आहरित कर लिया। इस संबंध में छात्र संगठनों ने कलेक्टर की जनसुनवाई में शिकायत दर्ज कराई थी।
जांच में आरोप सही पाए जाने का दावा, फिर भी राशि वापसी नहीं
शिकायत के बाद कलेक्टर के निर्देश पर संभागीय उपायुक्त, जनजातीय कार्य विभाग, शहडोल द्वारा मामले की जांच कराई गई। उपलब्ध विवरण के अनुसार, जांच में आरोप सही पाए गए। इसके बाद विभाग ने 27 जुलाई, 31 जुलाई, 3 अगस्त, 6 अगस्त और 13 अगस्त को लगातार नोटिस जारी किए। संबंधित व्हाट्सएप नंबर 9407033930 पर भी सूचना भेजे जाने की बात सामने आई।
इसके बावजूद न तो कथित रूप से बकाया राशि वापस की गई और न ही संतोषजनक जवाब मिलने की जानकारी सामने आई। विभागीय स्तर पर पहले कन्या शिक्षा परिसर, पाली का अतिरिक्त प्रभार वापस लिया गया। इसके बाद 31 जुलाई को निलंबन की कार्रवाई की गई और 2 सितंबर को तीन गंभीर आरोपों के संबंध में आरोप पत्र जारी किया गया।
हालांकि, विभागीय कार्रवाई के बावजूद छात्राओं की राशि की वापसी और कथित अनियमितता पर आपराधिक कार्रवाई का सवाल बना रहा।
27 अगस्त का आदेश, लेकिन पुलिस तक नहीं पहुंचा मामला?
इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम 27 अगस्त 2026 का बताया जा रहा है। कलेक्टर न्यायालय की नस्ती में पत्र क्रमांक 1269998/2026 के माध्यम से स्पष्ट आदेश जारी किए जाने की जानकारी है। आदेश के अनुसार, सहायक आयुक्त, जनजातीय कार्य विभाग, पूजा द्विवेदी को तत्काल पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराकर इसकी जानकारी प्रस्तुत करनी थी।
आदेश के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी विभागीय स्तर पर संबंधित अधिकारियों की थी। लेकिन उपलब्ध घटनाक्रम के मुताबिक, आदेश जारी होने के बाद लगभग 23 दिनों तक पुलिस अधीक्षक या थाना पाली को प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए आवेदन भेजे जाने का रिकॉर्ड सामने नहीं आया।
इस दौरान विभागीय नोटिस और आरोप पत्र जारी करने की प्रक्रिया चलती रही, लेकिन कलेक्टर के आदेश के अनुरूप पुलिस कार्रवाई आगे नहीं बढ़ सकी। आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्या यह केवल प्रशासनिक लापरवाही थी या आदेश के क्रियान्वयन में जानबूझकर देरी की गई? इन सवालों का जवाब संबंधित अधिकारियों से मिलना जरूरी है।
देरी के बीच हाईकोर्ट पहुंचीं सरिता जैन
इसी बीच संबंधित अधिकारी ने हाईकोर्ट, जबलपुर में याचिका क्रमांक WP-38539/2026 दायर की। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 19 सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की एकलपीठ ने कलेक्टर के 27 अगस्त वाले प्राथमिकी दर्ज कराने के आदेश को स्थगित अवस्था में रखने यानी abeyance में रखने का निर्देश दिया।
अदालत ने साथ ही विभागीय जांच को आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने से तीन महीने के भीतर पूरा करने का निर्देश दिया।
इस न्यायिक आदेश के बाद अब मामले में विभागीय जांच की समयसीमा महत्वपूर्ण हो गई है। लेकिन इससे पहले पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराने की कार्रवाई समय पर क्यों नहीं हुई, यह सवाल अपनी जगह कायम है।
23 दिनों की देरी किसके लिए बनी राहत?
इस प्रकरण का सबसे गंभीर पहलू यही है कि कलेक्टर के आदेश और हाईकोर्ट से राहत मिलने के बीच लगभग 23 दिनों का अंतर बताया जा रहा है। यदि इस अवधि में प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए आवश्यक आवेदन पुलिस तक नहीं पहुंचा, तो इसकी जिम्मेदारी किस अधिकारी की थी?
क्या आदेश के क्रियान्वयन में हुई देरी महज संयोग थी? क्या संबंधित फाइल निर्धारित प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाई गई थी? क्या किसी स्तर पर आदेश को लंबित रखा गया? इन सवालों की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
वर्तमान खंड शिक्षा अधिकारी की भूमिका और फाइल की वास्तविक आवाजाही की जांच से ही स्पष्ट हो सकेगा कि देरी के पीछे प्रशासनिक चूक थी या किसी स्तर पर जानबूझकर लापरवाही बरती गई। फिलहाल, बिना स्वतंत्र जांच के किसी अधिकारी की मिलीभगत को प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता।
छात्राओं के हक का पैसा कब लौटेगा?
इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल उन आदिवासी छात्राओं के हितों का है, जिनके लिए शासन ने शैक्षणिक और आवश्यक सामग्री की राशि उपलब्ध कराई थी। यदि राशि के दुरुपयोग के आरोप जांच में सही पाए गए हैं, तो उसकी वसूली और जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।
विभागीय कार्रवाई, निलंबन और आरोप पत्र जारी होने के बावजूद राशि की वापसी को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होना चिंता का विषय है। ऐसे मामलों में केवल कागजी कार्रवाई पर्याप्त नहीं है; छात्राओं के हितों की रक्षा और शासन की राशि की वसूली भी उतनी ही जरूरी है।
कलेक्टर के आदेश की अवहेलना पर क्या होगा?
अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं। क्या कलेक्टर इस बात की जांच कराएंगे कि 27 अगस्त के आदेश के बाद फाइल किन-किन अधिकारियों के पास रही? पुलिस को आवेदन भेजने में देरी क्यों हुई? क्या किसी स्तर पर जवाबदेही तय की जाएगी?
यह मामला केवल एक अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई तक सीमित नहीं है। यह प्रशासनिक आदेशों के पालन, विभागीय जवाबदेही और आदिवासी छात्राओं के अधिकारों से जुड़ा प्रश्न है।
जब कलेक्टर के स्पष्ट आदेश के क्रियान्वयन में ही देरी के सवाल उठ रहे हों, तो आम नागरिकों की शिकायतों पर प्रशासन कितनी तत्परता से कार्रवाई करता होगा? यही वह सवाल है, जिसका जवाब अब जिला प्रशासन को अपनी कार्रवाई और पारदर्शिता से देना होगा।


0 Comments