रिपोर्ट @मिर्जा अफसार बेग
घुनघुटी बस स्टैंड से रेलवे स्टेशन तक 500 मीटर का सफर जानलेवा, 8 टन की सड़क पर 50 से 60 टन तक गिट्टी का बोझ
उमरिया। आम जनता की सुगम और सुरक्षित आवाजाही के लिए बनाई गई प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की सड़क आज ओवरलोड गिट्टी से भरे हाइवा की मार झेल रही है। घुनघुटी से अनूपपुर को जोड़ने वाले मार्ग की बदहाली ने सड़क निर्माण की उपयोगिता और जिम्मेदार विभागों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालात यह हैं कि घुनघुटी बस स्टैंड से रेलवे स्टेशन तक करीब 500 मीटर का महत्वपूर्ण मार्ग गड्ढों में तब्दील हो चुका है। ग्रामीणों का आरोप है कि निर्धारित क्षमता से कई गुना अधिक भार लेकर दौड़ रहे हाइवा इस सड़क को बर्बाद कर रहे हैं, जबकि जिम्मेदार विभागों की चुप्पी आम लोगों की परेशानी बढ़ा रही है।
सड़क आम लोगों के लिए, लेकिन भारी वाहनों का कब्जा!
घुनघुटी बस स्टैंड से रेलवे स्टेशन तक का मार्ग स्थानीय लोगों के लिए किसी लाइफ लाइन से कम नहीं है। इसी रास्ते से प्रतिदिन सैकड़ों यात्री, बुजुर्ग, महिलाएं, दुकानदार और स्कूली बच्चे आवागमन करते हैं। लेकिन सड़क की बदहाली और भारी वाहनों की आवाजाही ने इस रास्ते को जोखिम भरा बना दिया है। अभिभावकों को बच्चों की सुरक्षा की चिंता सताती रहती है, वहीं राहगीरों को हर समय दुर्घटना की आशंका बनी रहती है।
8 से 10 टन की पासिंग, 50 से 60 टन तक लोडिंग का आरोप
स्थानीय लोगों के मुताबिक, तुमी और आसपास संचालित क्रेशरों से गिट्टी भरकर निकलने वाले हाइवा इस संकरे मार्ग से दिन-रात गुजरते हैं। ग्रामीणों का दावा है कि जिन वाहनों की क्षमता अथवा संबंधित सड़क की भार-सीमा 8 से 10 टन के आसपास बताई जाती है, उनमें 50 से 60 टन तक गिट्टी लादकर परिवहन किया जा रहा है। यदि इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह न केवल सड़क की उम्र को तेजी से घटाने वाला मामला है, बल्कि यातायात सुरक्षा के लिहाज से भी गंभीर चिंता का विषय है।
सड़क गायब, गड्ढों का साम्राज्य कायम
बस स्टैंड से रेलवे स्टेशन तक सड़क की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि जगह-जगह बड़े-बड़े गड्ढे नजर आते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि डामर और गिट्टी उखड़ चुके हैं तथा सड़क का मूल स्वरूप लगभग समाप्त हो गया है। बरसात के दौरान गड्ढों में पानी भर जाने से उनकी गहराई का अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में दोपहिया वाहन चालकों के लिए दुर्घटना का खतरा और बढ़ जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, कई बाइक सवार इन गड्ढों में गिरकर घायल भी हो चुके हैं।
तेज रफ्तार हाइवा, धूल के गुबार और हादसों का खतरा
घनी आबादी वाले इस मार्ग पर भारी वाहनों की आवाजाही ने लोगों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि तेज रफ्तार हाइवा कई बार बिना हॉर्न बजाए गुजरते हैं। इन वाहनों से उड़ने वाली धूल दुकानदारों, राहगीरों और आसपास रहने वाले लोगों के लिए परेशानी का कारण बन रही है। सवाल यह है कि जब इस मार्ग से स्कूली बच्चों और आम नागरिकों का नियमित आवागमन होता है, तो भारी वाहनों की आवाजाही पर प्रभावी नियंत्रण क्यों नहीं किया जा रहा है?
मुनाफा कहीं और, नुकसान उमरिया के हिस्से में?
इस पूरे मामले में खनिज परिवहन की व्यवस्था और प्रशासनिक समन्वय को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय स्तर पर यह दावा किया जा रहा है कि तुमी क्षेत्र के क्रेशरों और खदानों का संबंध अनूपपुर जिले से है, जबकि ओवरलोड वाहनों की आवाजाही से उमरिया जिले के घुनघुटी की सड़क को नुकसान उठाना पड़ रहा है। ग्रामीणों के मुताबिक, खनिज परिवहन से संबंधित रॉयल्टी और राजस्व व्यवस्था एक जिले से जुड़ी है, लेकिन सड़क की बदहाली का खामियाजा दूसरे जिले की जनता भुगत रही है।
हालांकि, खदानों की वास्तविक स्थिति, रॉयल्टी, वाहनों के स्वीकृत भार और संबंधित क्रेशरों की वैधानिकता की आधिकारिक जांच आवश्यक है। यदि नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो संबंधित संचालकों और जिम्मेदार पक्षों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
खनिज और परिवहन विभाग की भूमिका पर सवाल
ग्रामीणों का आरोप है कि सड़क की दुर्दशा और ओवरलोड वाहनों की आवाजाही की जानकारी होने के बावजूद संबंधित विभागों की ओर से प्रभावी कार्रवाई नहीं की जा रही है। ऐसे में खनिज विभाग, परिवहन विभाग, पुलिस और सड़क निर्माण से जुड़े अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने की मांग उठ रही है। आखिर सड़क की भार-सीमा का पालन कौन सुनिश्चित करेगा? ओवरलोड वाहनों की जांच कौन करेगा? और आम लोगों की सुरक्षा की जवाबदेही किसकी होगी?
ग्रामीणों की मांग—तत्काल कार्रवाई हो
घुनघुटी के ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि बस स्टैंड से रेलवे स्टेशन तक के करीब 500 मीटर के संवेदनशील मार्ग पर गिट्टी से भरे ओवरलोड हाइवा की आवाजाही तत्काल नियंत्रित की जाए। खनिज परिवहन के लिए वैकल्पिक मार्ग निर्धारित किया जाए, वाहनों के वास्तविक भार की जांच कराई जाए और सड़क को हुए नुकसान का तकनीकी आकलन कराया जाए। साथ ही, नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होने पर संबंधित क्रेशर संचालकों एवं अन्य जिम्मेदार पक्षों से नियमानुसार क्षतिपूर्ति वसूलकर सड़क की मरम्मत कराई जाए।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है, या घुनघुटी की इस जानलेवा सड़क को बचाने के लिए समय रहते ठोस कदम उठाए जाएंगे? सड़क जनता की सुविधा के लिए बनाई गई है, भारी वाहनों के अनियंत्रित बोझ तले उसे दम तोड़ने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। अब जरूरत है त्वरित जांच, जवाबदेही और प्रभावी कार्रवाई की, ताकि घुनघुटी के लोगों का सुरक्षित आवागमन सुनिश्चित हो सके।



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