रिपोर्ट @मिर्जा अफसार बेग
मां के बिछड़ने से अनाथ हुए 15–16 माह के दो मासूम शावक, वन विभाग की निगरानी में रहेंगे
उमरिया। विश्वविख्यात बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व से वन्यजीव प्रेमियों को झकझोर देने वाली दुखद खबर सामने आई है। पर्यटकों की चहेती और जंगल की पहचान बन चुकी बाघिन ‘डॉटी’ अब इस दुनिया में नहीं रही। उसकी मौत से जहां वन्यजीव प्रेमियों और पर्यटकों में शोक की लहर है, वहीं उसके पीछे छूट गए दो मासूम शावकों के भविष्य और सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। मां के साये से महरूम हुए ये दोनों शावक अब जंगल में अकेले जीवन जीने की चुनौती का सामना कर रहे हैं।
मझखेता बीट में मिला बाघिन का शव
प्राप्त जानकारी के अनुसार, 9 अक्टूबर की दोपहर बाद मानपुर बफर रेंज के मझखेता बीट में वन विभाग की टीम हाथियों की मदद से नियमित गश्त कर रही थी। इसी दौरान झाड़ियों के बीच एक मादा बाघ का शव दिखाई दिया। इसकी सूचना तत्काल वरिष्ठ वन अधिकारियों को दी गई। घटना की गंभीरता को देखते हुए पार्क प्रबंधन ने मौके पर पहुंचकर निर्धारित मानक संचालन प्रक्रिया के तहत घटनास्थल को सुरक्षित कर जांच शुरू कर दी।
डॉग स्क्वाड से जांच, पोस्टमार्टम में प्राकृतिक मौत की आशंका
बाघिन की मौत के कारणों का पता लगाने के लिए शाम को डॉग स्क्वाड की सहायता से घटनास्थल और आसपास के क्षेत्र की सघन जांच की गई। इस दौरान किसी संदिग्ध वस्तु या गतिविधि के संकेत नहीं मिलने की जानकारी सामने आई। इसके बाद पशु चिकित्सकों की टीम ने मौके पर ही बाघिन का पोस्टमार्टम किया। प्रारंभिक आकलन में उसकी मौत प्राकृतिक कारणों से होने की संभावना जताई गई है। हालांकि, वास्तविक कारणों की पुष्टि के लिए वन विभाग ने एहतियातन विसरा के नमूने सुरक्षित रखकर जांच के लिए भेजने की प्रक्रिया अपनाई है।
पूरे सम्मान के साथ दी गई अंतिम विदाई
सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करने के बाद वन विभाग की टीम ने बाघिन डॉटी का पूरे सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया। लकड़ियों की चिता सजाकर उसे फूल-मालाएं अर्पित की गईं। अपनी मौजूदगी और आकर्षण से पर्यटकों के दिलों में खास जगह बनाने वाली डॉटी की विदाई ने वन्यजीव प्रेमियों को भावुक कर दिया है। जंगल की इस परिचित पहचान के चले जाने से बांधवगढ़ के वन्यजीव संसार में एक खालीपन महसूस किया जा रहा है।
डॉटी के दो शावकों पर मंडराती भविष्य की चिंता
डॉटी की मौत के बाद सबसे बड़ा सवाल उसके दो शावकों की सुरक्षा और भविष्य को लेकर खड़ा हो गया है। बताया जा रहा है कि दोनों शावकों की उम्र लगभग 15 से 16 माह है। मां से बिछड़ने के बाद उन्हें क्षेत्र में अलग-अलग विचरण करते हुए देखा गया है। अब उन्हें जंगल में अपनी सुरक्षा करने, भोजन जुटाने और प्राकृतिक परिस्थितियों के बीच जीवनयापन करने की चुनौती का सामना करना होगा।
शावकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए वन विभाग ने संबंधित क्षेत्र में निगरानी बढ़ा दी है। उनकी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं और हाथी गश्ती दल की मदद से क्षेत्र की लगातार निगरानी की जा रही है।
प्राकृतिक वातावरण में ही रखी जाएगी निगरानी
वन अधिकारियों के अनुसार, दोनों शावक अब उस उम्र में हैं, जब वे शिकार करने की कला सीख चुके होते हैं और धीरे-धीरे स्वतंत्र जीवन के लिए तैयार होने लगते हैं। इसी आधार पर फिलहाल उन्हें जंगल के प्राकृतिक वातावरण में ही रहने देने की रणनीति अपनाई जा रही है। हालांकि, उनकी गतिविधियों और सुरक्षा पर लगातार नजर रखी जाएगी, ताकि आवश्यकता पड़ने पर समय रहते उचित कदम उठाए जा सकें।
एक मां की विदाई, दो जिंदगियों की नई चुनौती
बाघिन डॉटी की मौत केवल एक वन्यजीव की मृत्यु नहीं, बल्कि उन दो नन्हे शावकों के जीवन में आए बड़े बदलाव की कहानी भी है, जिन्हें अब अपनी मां के बिना जंगल की कठिन राह तय करनी है। बांधवगढ़ के घने जंगलों में डॉटी की मौजूदगी भले ही अब अतीत बन गई हो, लेकिन उसकी यादें वन्यजीव प्रेमियों के मन में बनी रहेंगी। अब सभी की निगाहें उसके दोनों शावकों पर टिकी हैं, जो मां की ममता से दूर होकर प्रकृति की पाठशाला में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।




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