रिपोर्ट @शम्भूनाथ सोनी
जिले में प्रशासनिक कसावट की जरूरत
उमरिया --- प्रशासनिक अधिकारियों की प्रयोगशाला बनी उमरिया में नवागत कलेक्टर के कार्य भार सम्हालते ही जिले भर में एक नयी बहस छिड़ गई है की कलेक्टर के साथ और क्या क्या बदलेगा ? दरअसल उमरिया जिले में पदस्थ राखी सहाय ने बीसवें कलेक्टर के रूप में सोमवार को जिला की कमान संभाली है । आप उमरिया जिले को तीसरी महिला कलेक्टर है। जब नया जिला उमरिया वर्ष 1998 में अस्तित्व में आया था तब जिले में पहली कलेक्टर के रूप में रेणु पिल्लई ने जो की वर्ष 1991 बैच की आइ एस अधिकारी थी और 10 जुलाई 1998 को उमरिया जिले की कमान सम्हाली थी और 16 जून 1999 तक कलेक्टर के रूप में काम की , लेकिन उनकी प्रशासनिक कार्य शैली ने न सिर्फ प्रशासनिक स्तर पर बेहतर काम करने का इतिहास कायम किया था ,साथ ही राज नेताओं को भी उनकी राज धर्म की लक्ष्मण रेखा में बांध रखा था । भले ही उन्हें अल्प समय में कलेक्टर का ताज उतर दिया , लेकिन कभी किसी के मन मुताबिक निर्णय नहीं किया , विधि संगत निर्णय लिए और उन्हे धरातल तक पहुंचाया । सत्ता धीशो का समान रूप से आदर किया लेकिन उनके लिए तय मापदण्डो से समझौता कभी नहीं किया । राजनीतिक नेताओं का पिछलग्गू पन की वह विरोधी थी और न्याय संगत काम करने में सदा तत्पर रहती थी ,उनकी यही खाशियत आज तक के कलेक्टरो की भीड़ से अलग कर रखा है । इसके बाद वर्ष 2007 में मधु खरे जी को सातवें कलेक्टर के रूप में काम करने का अवसर मिला। आप 26-12-2007 को पद भार ग्रहण की और 3-7-2009 तक इस दायित्व का निर्वहन किया। आपकी मिली जुली कार्य शैली जिले को कोई नयी पहचान नहीं दे पायी, वह कलेक्टरों की कतार का एक हिस्सा बन जैसे आयी ,वैसे चली गई। अब तीसरे महिला कलेक्टर के रूप में राखी सहाय जी को जिले की कमान मिली है आप 2015 बैच की प्रशासनिक अधिकारी है। पद भार ग्रहण के समय में ही उन्होंने संक्षिप्त बातचीत में ही कम शब्दों में वह सरकार की योजनाओं के प्रति बद्धता व्यक्त करने का संकल्प उन्होंने दोहराया हैं। बातचीत के दौरान उनके चेहरे से एक तरफ सौम्यता झलक रही थी,तो दुसरी ओर उनकी वाणी में मिठास के साथ वह ओज की किरणें,आत्म विश्वास भी दिखा जो की अन्य प्रशासनिक अधिकारियों से उन्हें अलग करता दिखाई दे रहा था, लेकिन इसे पर्याप्त नहीं कहा जा सकता। उमरिया जिले में जिस खूबसूरती की चाहत है, विकास की संभावनायें, समस्याओं का अंबार है, विकास योजनाओं को भष्ट्राचार के दलदल से उबारना है, प्रशासनिक अधिकारियों के स्वेच्छाचारिता पर अंकुश लगाने, जन मानस से जुडाव का मुद्दा के साथ राजनैतिक दबाव से ऊपर उठकर न्याय संगत और समाज के अंतिम छोर के व्यक्ति तक उसके हक सुलभ कराने जैसी अग्नि परीक्षा तो आगे है। जिले में आज भी अनेकों गाँव में एक्कीसवी सदी में बिजली, पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव बना हुआ है। इन सारी चुनौतियों से सुलझने का उपक्रम इन्ही परिस्थितियों में निकालना होगा।
उमरिया जिला जनसंख्या के आधार पर छोटा है, लेकिन राजनैतिक दंखलादाजी राजधानी से भी ज्यादा दिखाई दे रहा है। इन सभी विसंगतियों से अगर आप अपने विवेक पूर्ण कुशल प्रशासनिक दक्षता से निकल गयी तो निश्चित ही आपका कार्यकाल इतिहास के सुनहरे शब्दों के साथ यादगार बन जायेगा


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