रिपोर्ट @मिर्जा अफसार बेग
*शारदा OCM विवाद में नगर परिषद बकहो उपाध्यक्ष वैभव विक्रम सिंह का तीखा पलटवार, बोले— “गरीबों के हक़ की लड़ाई को दबाने नहीं देंगे”*
*हैवी ब्लास्टिंग से घरो मे पड़ रही दरार लाभ भी हो सकता है बड़ा हादसा एस ई सी एल मौन ?*
अमलाई,शहडोल जिले के अमलाई क्षेत्र स्थित शारदा ओपन कास्ट माइंस (OCM) में संचालित निजी खनन परियोजना को लेकर विवाद अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। निजी खनन कंपनी M/S RK Earth Resources Private Limited द्वारा नगर परिषद बकहो के जनप्रतिनिधियों पर रंगदारी और दबाव बनाने जैसे गंभीर आरोप लगाए जाने के बाद क्षेत्र की राजनीति और सामाजिक वातावरण में हलचल तेज हो गई है।
इसी बीच नगर परिषद बकहो के उपाध्यक्ष वैभव विक्रम सिंह ने खुलकर सामने आते हुए कंपनी के आरोपों को पूरी तरह निराधार, भ्रामक और सुनियोजित साज़िश करार दिया है। उन्होंने कहा कि जनहित से जुड़े मुद्दों को दबाने और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की छवि खराब करने के उद्देश्य से इस प्रकार के आरोप गढ़े जा रहे हैं।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि जनता के अधिकारों, स्थानीय युवाओं के रोजगार, विस्थापित परिवारों के पुनर्वास, प्रदूषण नियंत्रण और श्रमिक हितों की बात करना “रंगदारी” कहलाता है, तो वे यह संघर्ष आगे भी पूरी मजबूती के साथ जारी रखेंगे।
*“5 लाख महीना मांगने का आरोप मनगढ़ंत”*
उपाध्यक्ष वैभव विक्रम सिंह ने कंपनी द्वारा लगाए गए “5 लाख रुपये प्रतिमाह मांगने” के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यह पूरी तरह काल्पनिक कहानी है।
उन्होंने चुनौतीपूर्ण अंदाज़ में कहा कि यदि किसी जनप्रतिनिधि द्वारा किसी प्रकार की आर्थिक मांग की गई हो तो कंपनी वीडियो, ऑडियो रिकॉर्डिंग, व्हाट्सएप चैट या अन्य कोई ठोस प्रमाण सार्वजनिक करे। बिना प्रमाण इस तरह के आरोप लगाना केवल जनआंदोलन को कमजोर करने की कोशिश है।
उन्होंने कहा कि क्षेत्र की जनता और मजदूरों की आवाज़ उठाना उनका संवैधानिक दायित्व है और वे इसे किसी भी कीमत पर छोड़ने वाले नहीं हैं। झूठा आरोप लगाकर मेरी छवि धूमिल करने का प्रयास किया गया है जिसकी रिपोर्ट अमलाई थाने मे दर्ज है पुलिस विवेचना कर रही है जो भी तथ्य होंगे सामने आएंगे,नगर की जनता को भरोसा है और वो न्याय के साथ है।
*स्थानीय युवाओं की अनदेखी पर गहरा आक्रोश*
पूरे विवाद का सबसे बड़ा केंद्र स्थानीय युवाओं को रोजगार न मिलना बताया जा रहा है।
जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि जब खदान परियोजना प्रारंभ हुई थी, तब कंपनी ने स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता के आधार पर रोजगार देने का सार्वजनिक आश्वासन दिया था। लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत दिखाई दे रही है।
आरोप है कि कंपनी ने कोतमा, बिजुरी, अनूपपुर और उमरिया सहित अन्य क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रमिकों और कर्मचारियों की नियुक्ति कर ली, जबकि अमलाई और आसपास के गांवों के सैकड़ों युवा आज भी बेरोजगारी से जूझ रहे हैं।
उपाध्यक्ष वैभव विक्रम सिंह ने कहा कि क्षेत्र की खदानों से करोड़ों का खनिज निकाला जा रहा है, लेकिन स्थानीय युवाओं को उनका हक नहीं मिल रहा। इससे लोगों में गहरा असंतोष व्याप्त है।
*“HPC रेट के अनुसार मजदूरों को मिले भुगतान, वैभव*
श्री सिंह ने कंपनी पर श्रमिकों के शोषण का भी गंभीर आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि मजदूरों को HPC रेट के अनुसार भुगतान किया जाना चाहिए, लेकिन कंपनी मजदूरों के अधिकारों की अनदेखी कर रही है।
उन्होंने कहा कि मजदूरों का हक मारकर कंपनी स्वयं को विकास का प्रतीक बताने का प्रयास कर रही है, जबकि जमीनी सच्चाई इससे बिल्कुल अलग है।
*पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी के आरोप*
शारदा OCM परियोजना को लेकर पर्यावरणीय चिंताएं भी तेजी से सामने आ रही हैं।
स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि खदान क्षेत्र में धूल प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है। खदान से उड़ने वाली राख और धूल के कारण आसपास के गांवों में जनजीवन प्रभावित हो रहा है। खेतों की उपज पर असर पड़ रहा है तथा लोगों में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की आशंका बढ़ती जा रही है। हैवी ब्लास्टिंग से घरो मे दरारे पड़ रही है और एस ई सी एल प्रबंधन चुपचाप बैठ कर तमाशा देख रहा, श्री सिंह ने कहा भगवान न करें यदि हैवी ब्लास्टिंग से किसी तरह की जनहानी होती है तो प्रबंधन क्या उसकी जिम्मेदारी लेगा?
इसके अलावा भारी वाहनों की लगातार आवाजाही से सड़कों की स्थिति जर्जर हो चुकी है, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ गया है।
जनप्रतिनिधियों का कहना है कि कंपनी को केवल खनन लाभ तक सीमित न रहकर सामाजिक और पर्यावरणीय जिम्मेदारियों का भी पालन करना चाहिए।
*विस्थापित परिवारों की पीड़ा बनी बड़ा मुद्दा*
विवाद में विस्थापन और मुआवजे का मुद्दा भी प्रमुखता से उभरकर सामने आया है।
जनप्रतिनिधियों का कहना है कि जिन परिवारों की भूमि खदान परियोजना के लिए अधिग्रहित की गई, उन्हें आज तक समुचित मुआवजा और पुनर्वास नहीं मिल पाया। कई परिवार अब भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
इस स्थिति ने स्थानीय लोगों के बीच कंपनी के प्रति अविश्वास को और गहरा कर दिया है।
*“जनहित की लड़ाई को दबाने की कोशिश”*
उपाध्यक्ष वैभव विक्रम सिंह ने कहा कि कंपनी द्वारा मानसिक दबाव और तनाव जैसी बातें कहकर सहानुभूति बटोरने की कोशिश की जा रही है, ताकि वास्तविक मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाया जा सके।
उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधियों की भूमिका जनता की समस्याओं को प्रशासन और कंपनियों के सामने रखना है। यदि इसी कार्य को अपराध की तरह प्रस्तुत किया जाएगा, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिंताजनक स्थिति होगी।
*निष्पक्ष जांच की मांग तेज*
पूरे मामले को लेकर अब प्रशासन से निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की मांग तेज हो गई है।
जनप्रतिनिधियों का कहना है कि यदि निष्पक्ष जांच होती है तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि आखिर सच्चाई क्या है—
क्या वास्तव में जनप्रतिनिधियों ने किसी प्रकार का दबाव बनाया,या फिर जनहित से जुड़े सवालों को दबाने के लिए झूठे आरोपों का सहारा लिया गया।
*आंदोलन की राह पर बढ़ता अमलाई*
अमलाई क्षेत्र में इस मुद्दे को लेकर जनाक्रोश लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि रोजगार, मुआवजा, प्रदूषण और श्रमिक हितों जैसे मुद्दों का समाधान नहीं किया गया, तो आने वाले समय में बड़ा जनआंदोलन खड़ा हो सकता है।
फिलहाल यह विवाद केवल कंपनी और जनप्रतिनिधियों के बीच का संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि यह स्थानीय अधिकार, सामाजिक न्याय, रोजगार और पर्यावरण संरक्षण की बड़ी लड़ाई का रूप लेता जा रहा है।
अब सबकी निगाहें प्रशासनिक कार्यवाही और जांच प्रक्रिया पर टिकी हैं, जो तय करेगी कि इस संघर्ष में सच आखिर किसके साथ खड़ा है। श्री सिंह ने कहा कि जिस तरह कूटनीतिक रचना रच कर हम पर झूठा आरोप लगाया गया है, हम इसके लिए न्यायालय की शरण में जाएंगे, और यथासंभव कानून की मदद लेंगे ताकि सच्चाई सामने आ सके और दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए।




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