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आखिर आदिवासी छात्राओं को कब मिलेगा न्याय?

 


रिपोर्ट @शम्भूनाथ सोनी
एक पखवाड़ा बाद भी उपायुक्त के आदेश का नहीं हुआ पालन तो सड़क पर उतरी छात्रायें

*बिरसिंहपुर पाली --आज़ादी के 80 साल और "आदिवासी गौरव वर्ष" के इस दौर में भी अगर किसी सरकारी कन्या शिक्षा परिसर की आदिवासी बेटियों को अपने ही हक की छात्रवृत्ति के लिए और न्याय के लिए सड़कों पर उतरना पड़े, तो यह व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता है। बिरसिंहपुर पाली का शासकीय कन्या शिक्षा परिसर का मामला ठीक यही सवाल खड़ा कर रहा है ,जहाँ पर उपायुक्त आदिवासी विकास  विभाग शहडोल के आदेश के बाद भी कन्या शिक्षा  परिसर की तत्कालीन प्राचार्य श्रीमती सरिता जैन ने गरीब अनुसूचित जनजाति की छात्राओं से छात्रवृत्ति और शासकीय योजनाओं के नाम पर अवैध रूप से वसूली  धनराशि को छात्राओं को वापस करने के आदेश जारी किये गयें थे, लेकिन इस आदेश का पालन आज तक नहीं हुआ, विदित होवे की 27 जुलाई 2026 को संभागीय उपायुक्त आदिवासी विकास विभाग शहडोल  ने आदेश  जारी कर  दो दिन के भीतर सभी प्रभावित छात्राओं की अवैध वसूली गई राशि वापस करने के निर्देश दिये गये थे, लेकिन यह आदेश एक कागज के टूकड़े से ज्यादा असर कारी साबित नहीं हुई।
मालुम होवे की कन्या शिक्षा परिसर पाली के इस घोटाले को लेकर पहले विद्यार्थी परिषद के जिला संयोजक आकाश तिवारी ने इसकी शिकायत उपायुक्त आदिवासी विकास विभाग शहडोल और कलेक्टर उमरिया से कर जांच कार्यवाही की मांग की गयी थी, लेकिन जांच के बाद कार्यवाही के अभाव के कारण एडवोकेट बसंत तिवारी और सामाजिक कार्यकर्ता अरुण विश्वकर्मा को आमरण अनशन का सहारा लेना पडा, तब जाकर आरोपित सरिता जैन को छात्राओं से वसूली गयी राशि को वापस करने के निर्देश देते हुए खंड शिक्षा अधिकारी के पद से पृथक कर दिया गया था, लेकिन आंदोलन कारियों ने निलंबन की मांग पर अडे रहे , जिस पर आयुक्त आदिवासी विकास भोपाल ने निलंबन के आदेश जारी किये गये थे,लेकिन छात्राओं के हक की राशि सबंधित प्राचार्य के व्दारा अब तक प्रदत्त नहीं किये जाने से छात्राओं और अभिभावकों में आक्रोश की आग सुलग रही है, जिसके फलस्वरूप पहले छात्राओं और अभिभावकों ने 4 अगस्त 2026 को पुलिस अधीक्षक उमरिया के यहाँ लिखित आवेदन पत्र देकर पुलिस में प्रकरण पंजीबद्ध कराते हुए राशि वापस कराने का अनुरोध किया गया था,फिर भी बात नही  बनी तो 16  अगस्त 2026 को उनका  धैर्य जवाब दे गया और आदिवासी एकता के बैनर तले परिसर की छात्राएं, महिलाएं और अभिभावक सड़क पर उतर आए। उनके हाथों में बैनर था "शा. कन्या शिक्षा परिसर पाली के दोषी सरिता जैन पर पुलिस में प्रकरण पंजीबद्ध  करो, आदिवासी एकता जिंदाबाद"। नारों के बीच उनकी एक ही मांग थी - दोषी पर कार्रवाई और बेटियों का पैसा वापस दिलाओ।

इस सबके बाबजूद अब तक जिला प्रशासन के व्दारा छात्राओं से अवैध वसूली गई राशि वापस दिलाने में जिला प्रशासन के हाथ कांप रहे हैं। जानकर ताजुब होता है कि एक उच्च प्रशासनिक अधिकारी के आदेश के बाद छात्राओं से राशि वसूली के आरोप सही साबित होने के बाद भी प्रशासन छात्राओं के हितों की लगातार अनदेखी कर रहा है। जबकि यह अति संवेदनशील मामला है और आदिवासी छात्राओं के साथ हुये इस अत्याचार के तहत आदिवासी - हरिजन एक्ट के तहत कार्यवाही होनी चाहिए ,साथ ही छात्राओं से वसूली गयी धन राशि उनको लौटाया जाना चाहिए लेकिन न जाने एक दोषी को बचाने के लिए कितनी छात्राओं के भविष्य को दांव पर लगाया जायेगा।  इस आवेदन की प्रतिलिपि मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव, DGP, राष्ट्रीय और राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग सहित 16 वरिष्ठ अधिकारियों को भेजी गई। आवेदन के अंत में अभिभावकों ने चेतावनी भी दी है कि यदि अब भी विधिसम्मत कार्रवाई नहीं हुई तो वे कानून द्वारा उपलब्ध सक्षम मंचों पर न्याय के लिए जाएंगे।

यहां समीक्षा का विषय यह है कि जब विभागीय जांच पूरी हो चुकी है, दोष सिद्ध हो चुका है, निलंबन की कार्रवाई भी हो चुकी है और धनवापसी का आदेश भी जारी हो चुका है, तो फिर आपराधिक प्रकरण दर्ज करने में देरी क्यों? क्या किसी का संरक्षण प्राप्त है या फिर गरीब आदिवासी बेटियों का मामला होने के कारण इसे प्राथमिकता नहीं दी जा रही? जब शासन का आदेश दो दिन में पालन होना था और उसे 20 दिन से ज्यादा हो गए हैं, तो क्या सरकारी आदेशों की कोई कीमत बाकी बची है?

एक तरफ हम "बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ" और "आदिवासी अस्मिता" की बात करते हैं, दूसरी तरफ पाली की बेटियों को अपने सम्मान और हक के लिए अनशन, प्रदर्शन और आवेदन का रास्ता अपनाना पड़ रहा है। यह विरोधाभास अपने आप में  प्रशासनिक संवेदन हीनता को उजागर करता है कि
जांच, निलंबन और आदेश के बाद अब भी छात्राओं को उनका हक और  न्याय कब तक  मिलेगा।










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