रिपोर्ट @संतोष कुमार मिश्रा
परस्पर विरोधी आदेशों से खुलती कलई
उमरिया --- हर प्रशासनिक अधिकारी की पहली नैतिक जिम्मेदारी होती है कि वह अपने ही हस्ताक्षर से जारी आदेश का पालन करे और कानून की धाराओं में वर्णित शब्दों का सम्मान करे, लेकिन उमरिया जिला पंचायत में जबसे वर्तमान मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने कमान संभाली है, तबसे इस गरिमामय कुर्सी से निकलने वाले आदेश ही कानून को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। एक नहीं, ऐसे दर्जनों आदेश हैं जो नियम विरुद्ध हैं, लेकिन लोग एक वरिष्ठ अधिकारी के विरुद्ध बोलने से बचते हैं। ताजा मामला इसका सबसे बड़ा प्रमाण है, जहां अधिकारी ने अपने ही आदेश को 36 दिन में पलट दिया।
मामले के संबंध में बताया जाता है कि जिले के पाली जनपद पंचायत की ग्राम पंचायत गिजरी, जो पिछले एक वर्ष से लगातार सुर्खियों में है, जिला पंचायत उमरिया के नियम विरुद्ध आदेश के कारण फिर से चर्चा में आ गयी है। जिला पंचायत उमरिया से जारी आदेश क्रमांक पं./स्था./अनु.नि./2026/42 दिनांक 12 जनवरी 2026 में श्री देवेन्द्र कुमार अहिरवार को अनुकम्पा नियुक्ति पर ग्राम पंचायत सचिव बनाया जाता है। यह एक सामान्य नियुक्ति आदेश नहीं है, इसमें भविष्य के लिए शर्तें भी लिखी हैं। शर्त नंबर 11 में इसी कार्यालय ने साफ लिखा है कि "मध्यप्रदेश पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम 1993 की धारा 69(1) के तहत वित्तीय अधिकार प्रदत्त किया जावेगा, सचिव अधिसूचित होने तक मात्र प्रशासकीय कार्य संपादित करेंगे।" यानी वित्तीय लेन-देन का अधिकार नहीं होगा, साथ ही इस आदेश की दूसरी शर्त में स्पष्ट लिखा है कि "संबंधित सचिव को जनपद पंचायत पाली अंतर्गत 06 माह का प्रशिक्षण दिया जावेगा, 06 माह का प्रशिक्षण पूर्ण होने के पश्चात ही ग्राम पंचायत में सचिव के कार्य हेतु पदस्थ किया जावेगा।"
कागज पर अधिकारी ने खुद मान लिया कि यह नियुक्ति प्रशिक्षु के रूप में है, यह सचिव तीन साल तक परिवीक्षा पर रहेगा, इसे 10 हजार रुपये मानदेय मिलेगा, इसे अभी कोई वित्तीय प्रभार नहीं देना है। यह शर्त पंचायत सेवा नियमों के अनुरूप भी है।
जिला पंचायत के व्दारा यहाँ से फिर कहानी पलट दी । जिस 12 जनवरी को सचिव को अप्रशिक्षित मानकर सिर्फ प्रशासकीय कार्य तक सीमित रखा गया, उसी सचिव को आदेश क्रमांक 1097811/म.प्र./2026/जि.पं.उम. दिनांक 17 फरवरी 2026 में वित्तीय प्रभार सहित ग्राम पंचायत गिजरी में पदस्थ कर दिया जाता है।
खेद जनक कहा जाता है कि 36 दिन में ऐसा क्या हो गया कि 6 माह का प्रशिक्षण पूरा हुए बिना ही वित्तीय प्रभार सौंप दिया गया? विभागीय परीक्षा हुए बिना ही अधिसूचना जारी हो गई? हकीकत यह है कि इनमें से कुछ भी नहीं हुआ। फिर भी एक अप्रशिक्षित, अनाधिसूचित और परिवीक्षाधीन सचिव को एक झटके में सरकारी तिजोरी की चाबी थमाने के राज कुछ और ही है।
अनुकम्पा नियुक्ति में सचिव पदक पर नियुक्ति में नियम कहता है, की मध्यप्रदेश पंचायत सेवा (सचिव भर्ती एवं सेवा शर्तें) नियम 2011 और पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग का स्थायी आदेश दिनांक 04.05.2018 की कंडिका 3 स्पष्ट कहती है कि अनुकम्पा नियुक्त सचिव को वित्तीय प्रभार तभी मिलेगा जब वह निर्धारित प्रशिक्षण पूर्ण कर सक्षम अधिकारी द्वारा अधिसूचित हो जाए। परिवीक्षा अवधि में वित्तीय प्रभार देना पूरी तरह से गैर-कानूनी है। यानी 12 जनवरी का आदेश नियम के अनुसार था, लेकिन 17 फरवरी का आदेश उसी नियम को तोड़ने वाला तुगलकी फरमान बन गया।
जब जिला पंचायत का मुखिया ही कहेगा कि प्रशिक्षण जरूरी नहीं, अधिसूचना जरूरी नहीं, सीधे वित्तीय प्रभार लो, तो फिर जिले की तीनों जनपद पंचायतों के सचिव आचार संहिता का पालन क्यों करेंगे? क्यों वह पंचायत दर्पण पर साफ बिल अपलोड करेंगे? क्यों वह शासकीय धन की होली खेलने से परहेज करेंगे? यही सवाल आज हर ग्राम पंचायत में गूंज रहा है।
यह सिर्फ एक सचिव के पदस्थापना का मामला नहीं है, यह पूरे सिस्टम को दिए गए गलत संदेश का मामला है। जब रक्षक ही नियम तोड़ेगा तो भक्षक क्या करेंगे? अब गेंद कलेक्टर उमरिया के पाले में है कि क्या एक परिवीक्षाधीन, अप्रशिक्षित सचिव को वित्तीय प्रभार देना वैध है? यदि नहीं, तो 17 फरवरी के इस नियम विरुद्ध आदेश को निरस्त कर जिम्मेदार अधिकारी पर कार्यवाही तो बनती है, पर बडे़ साहब पर कार्यवाही करने में कलेक्टर असहाय बनी हुई है।


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