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रेत की नीलामी टली, अवैध कारोबारियों की बल्ले-बल्ले! शासन को रॉयल्टी का चूना, आखिर किसके संरक्षण में चल रहा खेल?

 


रिपोर्ट @मुर्तुजा अंसारी

नई नीलामी पर विराम के बीच शहडोल की नदियों से रेत चोरी पर सवाल, ब्यौहारी से जैतपुर तक अवैध उत्खनन रोकने की चुनौती

शहडोल। मध्य प्रदेश में इस साल रेत की नई नीलामी नहीं होने की खबर के बीच शहडोल जिले में रेत के अवैध कारोबार को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। नई नीलामी की प्रक्रिया भले ही आगे न बढ़े, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इससे रेत के अवैध उत्खनन और परिवहन पर भी रोक लग पाएगी? या फिर बिना वैध ठेकों के ही रेत का कारोबार अपने पुराने ढर्रे पर चलता रहेगा?

जिले के ब्यौहारी, देवलोंद, जयसिंहनगर, गोहपारू, सोहागपुर, बुढ़ार और जैतपुर जैसे क्षेत्रों में रेत के अवैध उत्खनन और परिवहन को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। स्थानीय स्तर पर उठ रही शिकायतों के बीच यह जानना जरूरी है कि आखिर नदियों से रेत निकालने और उसे बाजार तक पहुंचाने की गतिविधियों पर जिम्मेदार विभागों की कितनी निगरानी है।

ठेका नहीं, फिर भी बाजार में रेत की आपूर्ति कैसे?

पिछले वर्षों के अनुभवों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। जब वैध रेत खदानों के संचालन और ठेकों की स्थिति स्पष्ट नहीं होती, तब भी बाजार में रेत की आपूर्ति जारी रहने की परिस्थितियों की जांच जरूरी हो जाती है। आखिर रेत कहां से आ रही है? किन रास्तों से उसका परिवहन हो रहा है? और क्या इस पूरी प्रक्रिया में नियमों का पालन किया जा रहा है?

यदि बिना वैध अनुमति के रेत का उत्खनन और परिवहन हो रहा है, तो यह सीधे तौर पर शासन के राजस्व को नुकसान पहुंचाने वाला मामला है। ऐसे में केवल कार्रवाई के दावे पर्याप्त नहीं होंगे, बल्कि धरातल पर निगरानी और जांच के परिणाम भी सामने आने चाहिए।

रॉयल्टी का नुकसान, जिम्मेदारों की निगरानी पर सवाल

रेत के अवैध कारोबार की आशंकाओं के बीच सबसे बड़ा सवाल शासन को मिलने वाली रॉयल्टी का है। वैध खनन से प्राप्त होने वाला राजस्व सरकारी खजाने का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में यदि अवैध उत्खनन जारी है, तो इसकी जिम्मेदारी तय करना प्रशासन के लिए जरूरी हो जाता है।

क्या संबंधित विभागों को इन गतिविधियों की जानकारी है? यदि जानकारी है, तो अब तक कितनी कार्रवाई की गई? क्या अवैध उत्खनन में इस्तेमाल होने वाले वाहनों और संबंधित कारोबारियों की पहचान की गई है? इन सवालों का जवाब सार्वजनिक होना चाहिए।

नई नीलामी की प्रक्रिया से जुड़ी नीतियां और प्रशासनिक निर्णय अपनी जगह हैं, लेकिन उनका असर नदियों और खनन क्षेत्रों में दिखाई देना भी उतना ही जरूरी है। ब्यौहारी से जैतपुर तक उठ रहे सवालों के बीच अब निगाहें खनिज विभाग और जिला प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हैं।

आखिर कब थमेगा नदियों से रेत निकालने का कथित अवैध खेल? नई नीलामी टलने के बाद सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वैध व्यवस्था के अभाव में अवैध कारोबार को पनपने से कैसे रोका जाए। यदि कहीं अवैध उत्खनन हो रहा है, तो उसकी निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारों पर कार्रवाई ही शासन के राजस्व और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकती है।

अब सवाल सिर्फ रेत की नीलामी का नहीं, बल्कि यह भी है कि जिले की नदियों से हो रहे कथित अवैध उत्खनन पर जिम्मेदार विभाग कब ठोस जवाब देंगे।



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