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आज भी अंधेरे में जीने को मजबूर आदिवासी गाँव

 


रिपोर्ट @शम्भूनाथ सोनी

विकास के दावों के बीच बिजली जैसी मूलभूत सुविधा से वंचित सैकड़ों आदिवासी परिवार

उमरिया  -- जब पूरा देश डिजिटल इंडिया, स्मार्ट गाँव और विकसित भारत की ओर तेजी से बढ़ रहा है, तब उमरिया जिले के पाली विकासखंड के   घुनघुटी ग्राम पंचायत की आदिवासी बहुल गांव  गाँधीग्राम, और कठई ग्राम पंचायत की चिनकी,सांस, गढकुर जैसे वनांचल आदिवासी  बहुल गांवों में बिजली जैसी मूलभूत सुविधा से  आज भी बिजली जैसी बुनियादी सुविधा के लिए तरस रहे  है, जहाँ पर सूर्यास्त होते ही पूरे  गाँव अंधेरे की आगोस की घनी  चादर में डूब जाता है , जिससे  ऐसा प्रतीत होता है मानो समय अभी भी अठारहवीं शताब्दी में  ठहरा हुआ है। 

घुनघुटी ग्राम पंचायत के सांस गाँव में लगभग तीन सौ भूमिया (भील) आदिवासी परिवार जो की बैगा प्रजाति से जुडा माना जाता है , इस गाँव के आदिवासी दिन भर खेतों में और घुनघुटी से  मेहनत-मजदूरी कर जब शाम को घर लौटते हैं तब दिनभर कठिन परिश्रम करने के बाद जब ग्रामीण अपने घरौंदे में प्रवेश करते हैं, तब   उनका स्वागत धुंध अंधकार के व्दारा किया जाता है, जब आज भारत इक्कीसवीं सदी के आधुनिक सुविधाओं से सूर्य की भांति जगमगाती  रोशनी  से होती है तब इन  गांवों के आदिवासियों का अभिनंदन  घोर अंधकार से होता है। आदिवासी बच्चों की पढ़ाई विशेष कर  प्रभावित होती है, महिलाओं को घरेलू कार्यों में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है , क्योंकि आज भी  ग्रामीणों का जीवन  ढिबरी एवं लालटेन की सीमित रोशनी तक सिमटा हुआ है।

सबसे बड़ा दुर्भाग्य इन गांवों का यह है कि चुनावी मौसम में बरसाती  नेताओं  जनप्रतिनिधियों और उनके नुमाइंदों  की आवाजाही तो होती है, आदिवासियों को बिजली के सब्ज बाग भी दिखाये जाते हैं, विकास के अनेक वादे परोसे  जाते हैं, किन्तु चुनाव समाप्त होते ही आदिवासियों की थाली खाली की खाली रह जाती है। विदित होवे की  वर्षों से ग्रामीण बिजली उपलब्ध कराने  की मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी यह जायज़ मांग अब तक पूरी नहीं हो सकी है।इसके लिए न क्षेत्र के जनप्रतिनिधि आवाज बुलंद करते हैं, न इस ओर प्रशासनिक  पहल होती है, जबकि बिजली अब  केवल एक प्रकाश का माध्यम बची बल्कि यह एक ऐसी  सुविधा बन गयी है, जो की आज जीवन  के हर पहलु को प्रभावित करती है। जैसे  शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, मनोरंजन के साधन, दूर संचार के साथ ही आज आर्थिक विकास का आधार भी बनी हुई  है। बिजली के अभाव में गाँव के बच्चे आधुनिक शिक्षा से पीछे छूट रहे हैं तथा ग्रामीण शासन की अनेक योजनाओं का पूरा लाभ नहीं उठा पा रहे हैं।

वर्तमान में केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा 'धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान' संचालित किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य आदिवासी क्षेत्रों का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित करना है। ऐसे में इन बिजली विहीन  गाँवों को प्राथमिकता के आधार पर बिजली सुविधा से जोड़ना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

इन गाँवों  के ग्रामीणों ने शासन, प्रशासन, जनप्रतिनिधियों एवं समाजसेवियों से मार्मिक अपील की है कि उनके गाँव तक भी विकास की रोशनी पहुँचाई जाए। जिस दिन यहाँ के घरों में पहला बल्ब जलेगा, उस दिन केवल अंधेरा ही नहीं मिटेगा, बल्कि सैकड़ों आदिवासी परिवारों के सपनों को भी नया उजाला मिलेगा।

अब प्रश्न यह है कि क्या जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि गाँधीग्राम की इस पीड़ा को सुनेंगे, या फिर यह गाँव आने वाले वर्षों तक भी विकास की रोशनी से वंचित रहेगा?


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