रिपोर्ट @शम्भूनाथ सोनी
उमरिया -- मध्यप्रदेश के सबसे बड़े विद्युत उत्पादन केंद्र, संजय गांधी ताप विद्युत गृह बिरसिंहपुर की यूनिट क्रमांक तीन -चार में पिछले एक दशक से एक ही अधिकारी के हवाले होने से पदस्थापना संबंधी मामलो में सवालिया निशान लग रहा है। संजय गाँधी ताप परियोजना में पदस्थ इस अधिकारी की पदस्थापना और कार्य शैली इन दिनों परियोजना और उसके बाहर चर्चा का विषय बन गई है। प्रशासनिक नियमों के अनुसार किसी भी संस्थान में संवेदनशील पदों पर समय-समय पर स्थानांतरण कर एक अधिकारी को दुसरे स्थान पर भी बेहतर कार्य करने, सवालों से बचाव करने जैसे बिंदुओं को ध्यान पर रखकर तबादला की प्रक्रिया को लागू किया गया है,जो देखने में भी आता है, और यह प्रक्रिया होनी भी चाहिए, बावजूद इसके एक अधिकारी को वर्षों तक एक ही सेक्शन में बने रहना क्षेत्र के जानकर नागरिकों और परियोजना के अन्य अधिकारियों के लिए कौतूहल का बिषय बना हुआ है।
"प्रभाव बढ़ना स्वाभाविक है कर्मचारी
सूत्रों के अनुसार संबंधित अधिकारी ने इसी यूनिट में रहते हुए पदोन्नति तो पाई, लेकिन कार्यक्षेत्र में बड़ा बदलाव नहीं हुआ। विद्युत गृह के कर्मचारियों में यह धारणा है कि लंबे समय तक एक ही संवेदनशील पद पर रहने से अधिकारी का स्थानीय स्तर पर प्रभाव बढ़ता है। इससे ठेका, मेंटेनेंस और तकनीकी निर्णयों में पारदर्शिता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
*जांच की मांग: एमबी से लेकर संपत्ति तक*
चर्चा यह भी है कि यूनिट में पिछले कुछ वर्षों में हुए तकनीकी और मेंटेनेंस कार्यों की गुणवत्ता तथा ठेका आवंटन प्रक्रिया पर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। इन दावों की समाचार पत्र` स्वतंत्र रूप से इन आरोपों की पुष्टि नहीं करता है। फिर भी सवालों से नकारा नहीं जा सकता। इसके साथ ही यह मांग भी उठी है कि पिछले 5 वर्षों में अधिकारी की संपत्ति में हुई वृद्धि के स्रोतों की भी जांच हो, ताकि "आर्थिक चमत्कार" पर लगे सभी संशयों का निराकरण हो सके।
*सुशासन का तकाजा: समीक्षा जरूरी*
शासन के जानकारों का मानना है कि किसी भी सार्वजनिक उपक्रम में संवेदनशील पदों पर लंबे समय तक जमे रहने वाले अधिकारियों के कार्यकाल की समय-समय पर समीक्षा सुशासन का हिस्सा है। यदि सभी कार्य नियमों के अनुरूप हुए हैं, तो निष्पक्ष जांच से अधिकारी की कार्यप्रणाली पर लगे सभी प्रश्नचिह्न हट जाएंगे और अनावश्यक चर्चाओं पर विराम लगेगा।
*अब प्रबंधन पर निगाहें*
अब सबकी निगाहें संजय गाँधी ताप परियोजना के प्रबंधन पर हैं। क्षेत्र की मांग है कि वह इन चर्चाओं को गंभीरता से ले और उच्च स्तरीय, पारदर्शी जांच कराए। इससे सच्चाई सामने आएगी, आरोपों पर लगाम लगेगी और यदि कोई दोषी पाया जाता है तो न्यायसंगत कार्रवाई से संस्थान की छवि को नुकसान से बचाया जा सकेगा।



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