रिपोर्ट @शम्भूनाथ सोनी
पट्टा कहीं और का पेड़ काट डाला कहीं और का
बेली में बड़े खेल पर पर्दा अधिकारी नोटिस देकर साधी चुप्पी
भारी कटान करने वालों को अभयदान, एक एक पेड़ काटने वाले गरीबों को नोटिस
बिरसिंहपुर पाली---उमरिया जिले की पाली जनपद अंतर्गत ग्राम पंचायत बेली में राजस्व भूमि पर लगे सैकड़ों यूकेलिप्टस के पेड़ों की अवैध कटाई का बड़ा मामला सामने आया है। ग्रामीणों का आरोप है कि राजस्व की भूमि पर खड़ा सरकारी यूकेलिप्टस का पूरा प्लांटेशन काट किसानों द्वारा दिया गया और लकड़ी को दूसरे स्थान के निजी पट्टे की आड़ में ठेकेदारों के माध्यम से बाहर भेज दिया गया। हैरानी की बात यह है कि इस बड़े पैमाने की कटाई पर राजस्व और वन विभाग के अधिकारियों कर्मचारियों ने आंखें मूंद रखी हैं, जबकि गांव के जिन गरीब आदिवासियों ने अपने खेत की मेड़ या घर के उपयोग के लिए एक एक पेड़ काटा, उन्हें विभाग नोटिस थमा रहा है।
स्थानीय लोगों के अनुसार बेली पंचायत के अंतर्गत राजस्व खसरे की उस भूमि पर वर्षों पहले वन विभाग और पंचायत के सहयोग से यूकेलिप्टस का रोपण किया गया था। ये पेड़ अब पूरी तरह तैयार थे और राजस्व की संपत्ति माने जाते हैं। आरोप है कि पिछले कुछ हफ्तों में रात के समय मजदूरों की मदद से इन पेड़ों की अंधाधुंध कटाई कराई गई। कटे हुए लॉग को गाड़ियों में भरकर गांव से बाहर ले जाया गया।
खेल यहीं खत्म नहीं हुआ। सूत्रों का कहना है कि पकड़े जाने से बचने के लिए ठेकेदारों ने दूसरे गांव के एक निजी पट्टे के कागजात का इस्तेमाल किया। कागजों में दिखाया गया कि लकड़ी निजी जमीन से काटी गई है, जबकि हकीकत में पूरी लकड़ी राजस्व की जमीन से आई थी। इसी फर्जी पट्टे के आधार पर ट्रांजिट पास बनवाकर लकड़ी को उमरिया और शहडोल के आरा मिलों तक पहुंचा दिया गया। ग्रामीणों ने बताया कि जब उन्होंने पटवारी और पंचायत सचिव से इस बारे में पूछा तो उन्हें कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
इस पूरे मामले में विभागीय दोहरा मापदंड सबसे ज्यादा चर्चा में है। ग्रामीण रामलाल बैगा और सुनीता बाई का कहना है कि उन्होंने पिछले साल अपने घर की मरम्मत के लिए एक एक यूकेलिप्टस का पेड़ काटा था, जिस पर वन विभाग ने वहीं राजस्व की सैकड़ों पेड़ों की कटाई पर आज तक न तो कोई एफआईआर हुई है और न ही किसी ठेकेदार या सरगना को नोटिस दिया गया है। ग्रामीण पूछ रहे हैं कि क्या कानून सिर्फ गरीबों के लिए है।
नियमानुसार गांव में किसी भी प्रकार के पेड़ों की कटाई के लिए भू स्वामी को पहले सूचना पत्र और स्व घोषणा पत्र अनुविभागीय अधिकारी के समक्ष जमा करना होता है और जांच प्रतिवेदन के आधार पर ही वन विभाग कटाई की अनुमति जारी करता है। बेली के इस मामले में ग्रामीणों का दावा है कि ऐसी कोई भी अनुमति नहीं ली गई और न ही ग्राम सभा में कोई प्रस्ताव रखा गया। यदि अनुमति ली भी गई है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
ग्रामीणों ने कलेक्टर उमरिया से मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच राजस्व, वन और पंचायत की संयुक्त टीम से कराई जाए। मांग है कि सैटेलाइट इमेज और पुराने खसरा नक्शे से मिलान कर यह स्पष्ट किया जाए कि कटे हुए पेड़ किस खसरा नंबर के थे। साथ ही जिन गाड़ियों सेऔर ट्रकों से लकड़ी ढुलाई हुई है, उनके रजिस्ट्रेशन नंबर और आरा मिलों के स्टॉक रजिस्टर की जांच हो। दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों, पंचायत के जिम्मेदारों और ठेकेदारों पर वन अधिनियम और शासकीय संपत्ति को क्षति पहुंचाने की धाराओं में कार्रवाई की जाए।
इस संबंध में मानपुर के संबंधित अधिकारियों से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन समाचार लिखे जाने तक कोई आधिकारिक बयान नहीं मिल सका। ग्रामीणों का कहना है कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो वे जनदर्शन में शिकायत के साथ साथ उच्च न्यायालय की शरण लेंगे। बेली का यह मामला सिर्फ पेड़ों की कटाई का नहीं है, बल्कि यह बताता है कि कैसे राजस्व की संपत्ति को कागजों के हेरफेर से निजी मुनाफे में बदला जा रहा है और छोटी मछलियों को फंसाकर बड़ी मछलियों को बचाया जा रहा है।राजस्व के यूकेलिप्टस काटकर दूसरे पट्टे पर ठेकेदारों को सप्लाई, बेली में बड़े खेल पर पर्दा
भारी कटान करने वालों को अभयदान, एक एक पेड़ काटने वाले गरीबों को नोटिस
उमरिया। जिले की मानपुर जनपद अंतर्गत ग्राम पंचायत बेली में राजस्व भूमि पर लगे सैकड़ों यूकेलिप्टस के पेड़ों की अवैध कटाई का बड़ा मामला सामने आया है। ग्रामीणों का आरोप है कि राजस्व की भूमि पर खड़ा सरकारी यूकेलिप्टस का पूरा प्लांटेशन काट दिया गया और लकड़ी को दूसरे स्थान के निजी पट्टे की आड़ में ठेकेदारों के माध्यम से बाहर भेज दिया गया। हैरानी की बात यह है कि इस बड़े पैमाने की कटाई पर राजस्व और वन विभाग ने आंखें मूंद रखी हैं, जबकि गांव के जिन गरीब आदिवासियों ने अपने खेत की मेड़ या घर के उपयोग के लिए एक एक पेड़ काटा, उन्हें विभाग नोटिस थमा रहा है।
स्थानीय लोगों के अनुसार बेली पंचायत के अंतर्गत राजस्व खसरे की उस भूमि पर वर्षों पहले वन विभाग और पंचायत के सहयोग से यूकेलिप्टस का रोपण किया गया था। ये पेड़ अब पूरी तरह तैयार थे और राजस्व की संपत्ति माने जाते हैं। आरोप है कि पिछले कुछ हफ्तों में रात के समय जेसीबी और मजदूरों की मदद से इन पेड़ों की अंधाधुंध कटाई कराई गई। कटे हुए लॉग को ट्रैक्टर ट्रालियों में भरकर गांव से बाहर ले जाया गया।
खेल यहीं खत्म नहीं हुआ। सूत्रों का कहना है कि पकड़े जाने से बचने के लिए ठेकेदारों ने दूसरे गांव के एक निजी पट्टे के कागजात का इस्तेमाल किया। कागजों में दिखाया गया कि लकड़ी निजी जमीन से काटी गई है, जबकि हकीकत में पूरी लकड़ी राजस्व की जमीन से आई थी। इसी फर्जी पट्टे के आधार पर ट्रांजिट पास बनवाकर लकड़ी को उमरिया और शहडोल के आरा मिलों तक पहुंचा दिया गया। ग्रामीणों ने बताया कि जब उन्होंने पटवारी और पंचायत सचिव से इस बारे में पूछा तो उन्हें कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
इस पूरे मामले में विभागीय दोहरा मापदंड सबसे ज्यादा चर्चा में है। कहना है कि उन्होंने पिछले साल अपने घर की मरम्मत के लिए एक एक यूकेलिप्टस का पेड़ काटा था, जिस पर राजस्व विभाग नोटिस भेज दिया। वहीं की सैकड़ों पेड़ों की कटाई पर आज तक न तो कोई एफआईआर हुई है और न ही किसी ठेकेदार या सरगना को नोटिस दिया गया है। ग्रामीण पूछ रहे हैं कि क्या कानून सिर्फ गरीबों के लिए है। ग्राम बेली,ग्राम जमुहाई ,इनके द्वारा भारी मात्रा में यूकोलिपटिस कटवा सप्लाई दी गई है जो बेली क्षेत्र के पटवारी महीनो से आंख बंद कर आना-जाना होता था ना इन्होंने ट्रक में कार्यवाही की ना काटने वालों के ऊपर कार्यवाही हुई
नियमानुसार गांव में किसी भी प्रकार के पेड़ों की कटाई के लिए भू स्वामी को पहले सूचना पत्र और स्व घोषणा पत्र अनुविभागीय अधिकारी के समक्ष जमा करना होता है और जांच प्रतिवेदन के आधार पर ही वन विभाग कटाई की अनुमति जारी करता है। बेली के इस मामले में ग्रामीणों का दावा है कि ऐसी कोई भी अनुमति नहीं ली गई और न ही ग्राम सभा में कोई प्रस्ताव रखा गया। यदि अनुमति ली भी गई है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
ग्रामीणों ने कलेक्टर उमरिया से अपील की है निष्पक्ष जांच राजस्व, वन विभाग और पंचायत की संयुक्त टीम से कराई जाए। मांग है कि सैटेलाइट इमेज और पुराने खसरा नक्शे से मिलान कर यह स्पष्ट किया जाए कि कटे हुए पेड़ किस खसरा नंबर के थे। साथ ही जिन ट्रैक्टर ट्रालियों और ट्रकों से लकड़ी ढुलाई हुई है, उनके रजिस्ट्रेशन नंबर और आरा मिलों के स्टॉक रजिस्टर की जांच हो। दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों, पंचायत के जिम्मेदारों और ठेकेदारों पर वन अधिनियम और शासकीय संपत्ति को क्षति पहुंचाने की धाराओं में कार्यवाही की जाए।
इस संबंध में बेली पटवारी से फोन से संपर्क किया गया उन्होंने फोन उठाना उचित नहीं समझा संबंधित अधिकारियों से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन समाचार लिखे जाने तक कोई आधिकारि बयान नहीं मिल सका। ग्रामीणों का कहना है कि यदि पेड़ काटने वालों को बचाया गया कार्यवाही नहीं हुई तो लिखित शिकायत अधिकारियों को करेंगे बेली का यह मामला सिर्फ पेड़ों की कटाई का नहीं है, बल्कि यह बताता है कि कैसे राजस्व की संपत्ति को कागजों के हेरफेर से निजी मुनाफे में बदला जा रहा है और छोटी मछलियों को फंसाकर बड़ी मछलियों को बचाया जा रहा है।



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