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रेलवे निर्माण घोटाले की जांच पर उठे सवाल: क्या अपने ही अधिकारियों की होगी निष्पक्ष जांच?

 


रिपोर्ट @शम्भूनाथ सोनी

 *उमरिया।* दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे, बिलासपुर मंडल के अंतर्गत कटनी–बिलासपुर मुख्य रेलखंड के *बंधवावारा–घुनघुटी सेक्शन (किमी 922 से 924) के बीच करोड़ों रुपये की लागत से कराए जा रहे नाली निर्माण एवं सेस रिपेयर कार्यों* में कथित घटिया निर्माण, निम्न गुणवत्ता की सामग्री के उपयोग तथा वित्तीय अनियमितताओं संबंधी समाचार प्रकाशित होने के बाद रेलवे प्रशासन ने विजिलेंस जांच प्रारंभ कर दी है। किंतु अब जांच की निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर गंभीर प्रश्न उठने लगे हैं।

स्थानीय नागरिकों  का आरोप है कि जांच प्रक्रिया अपेक्षित गंभीरता से संचालित होती नहीं दिख रही। जानकारी के अनुसार *10 जुलाई 2026* को बिलासपुर से पहुंचे उप मुख्य सतर्कता अधिकारी (Dy. CVO) स्वयं निर्माण स्थल का निरीक्षण करने नहीं पहुंचे और रेस्ट हाउस से ही अपने अधीनस्थ निरीक्षकों को औपचारिक जांच के निर्देश देकर लौट गए। इससे लोगों के बीच यह धारणा बन रही है कि करोड़ों रुपये के इस संवेदनशील मामले में केवल औपचारिकता निभाई जा रही है।

जानकारों का कहना है कि रेलवे विजिलेंस निरीक्षक मूलतः इंजीनियरिंग विभाग के *सीनियर सेक्शन इंजीनियर (SSE) संवर्ग के अधिकारी होते हैं,* जिन्हें सीमित अवधि के लिए विजिलेंस विभाग में प्रतिनियुक्त किया जाता है। कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें पुनः उसी इंजीनियरिंग विभाग में लौटकर सहायक मंडल अभियंता एवं वरिष्ठ मंडल अभियंता के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करना होता है। ऐसे में जब जांच उन्हीं अधिकारियों अथवा उसी प्रशासनिक तंत्र से जुड़े मामलों की हो, *तो हितों के टकराव (Conflict of Interest)* की आशंका स्वाभाविक रूप से सामने आती है।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जिस अधिकारी को कुछ समय बाद फिर उन्हीं वरिष्ठ अधिकारियों के अधीन कार्य करना है, उससे उनके विरुद्ध पूर्णतः स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की अपेक्षा करना कठिन है। यही कारण है कि रेलवे में भ्रष्टाचार के मामलों पर प्रभावी अंकुश नहीं लग पा रहा और समय-समय पर विभिन्न विभागों के अधिकारियों के रिश्वत लेते हुए पकड़े जाने की घटनाएं भी सामने आती रहती हैं।

नागरिकों का यह भी कहना है कि मुख्य रेल लाइन के मध्य चल रहे इस महत्वपूर्ण निर्माण कार्य पर करोड़ों रुपये का सार्वजनिक धन व्यय किया गया है। यदि ऐसे मामलों की तकनीकी एवं वित्तीय जांच भी केवल औपचारिकता बनकर रह जाए, तो न केवल सरकारी धन की सुरक्षा पर प्रश्न उठेंगे बल्कि रेल संरक्षा से जुड़े गंभीर मुद्दे भी अनुत्तरित रह जाएंगे।

जनप्रतिनिधियों, सामाजिक संगठनों एवं जागरूक नागरिकों ने मांग की है कि इस प्रकरण की *जांच बिलासपुर मंडल की स्थानीय विजिलेंस टीम के बजाय किसी अन्य जोन की रेलवे विजिलेंस, रेलवे बोर्ड विजिलेंस अथवा केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) की स्वतंत्र टीम से कराई जाए। उनका मानना है कि "दूध का दूध और पानी का पानी" तभी हो सकता है* जब जांच पूरी तरह स्वतंत्र एजेंसी द्वारा निष्पक्ष एवं तकनीकी आधार पर की जाए।

लोगों का कहना है कि प्रधानमंत्री द्वारा भ्रष्टाचार मुक्त एवं गुणवत्तापूर्ण आधारभूत संरचना निर्माण के लक्ष्य को कुछ भ्रष्ट अधिकारियों की कार्यशैली से आघात पहुंच रहा है। भारतीय रेलवे आज भी गुणवत्ता और विश्वसनीयता की पहचान रखती है, लेकिन यदि ऐसे मामलों में दोषियों पर निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई तो संस्थान की वर्षों से बनी साख पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

स्थानीय नागरिकों ने रेलवे बोर्ड, रेल मंत्रालय एवं केंद्रीय सतर्कता आयोग से मांग की है कि पूरे मामले की स्वतंत्र उच्च स्तरीय विजिलेंस एवं तकनीकी जांच कराई जाए, जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए तथा दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों, कर्मचारियों और संबंधित एजेंसियों के विरुद्ध नियमानुसार कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, ताकि जनता का विश्वास बना रहे और रेलवे निर्माण कार्यों में गुणवत्ता एवं पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके।


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