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आयुक्त के आदेश का नहीं हुआ पालन

 


रिपोर्ट @शम्भूनाथ सोनी

अतिथि शिक्षकों की भर्ती में मनमानी चरम पर 

अतिथि शिक्षकों को दिखाया बाहर का रास्ता 

*उमरिया।* जनजातीय कार्य विभाग के आयुक्त के निर्देशों के बाद मध्यप्रदेश के सभी आदिवासी जिलों में GFMS पोर्टल की खामी को दूर कर दिया गया है। लेकिन उमरिया जिला प्रशासन अभी भी इस आदेश को लागू करने में फिसड्डी साबित हो रहा है। न जाने इस मामले में उमरिया जिला प्रशासन कब कुंभकर्णी निंद्रा से जागेगा। आदेश के पालन न होने के कारण 

 अतिथि शिक्षकों के अनुभव अंकों का लाभ न मिलने से कुछ शिक्षकों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। मालूम होवे की पोर्टल में तकनीकी गड़बड़ी के कारण ऑफलाइन अनुभव प्रमाण पत्र वाले शिक्षकों के अंक स्कोर कार्ड में नहीं जुड़ रहे थे। इस पर आयुक्त स्तर से निर्देश जारी हुए कि ऐसे शिक्षकों के अंक मैनुअली जोड़े जाएं, ताकि वर्षों से अध्यापन कार्य करा रहे, अतिथि शिक्षकों की रोजी रोटी बरकरार बनी रहे। लेकिन ठीक इसके उलट फेर अतिथि शिक्षकों को मैन्युअल अंक नहीं दिये जाने से वर्षों पुराने अतिथि शिक्षक अपनी रोजी रोटी गवां बैठे। आयुक्त के आदेश के संदर्भ में न तो सहायक आयुक्त उमरिया  ने भर्ती के पूर्व आदेश प्रसारित किया और न ही अनुमोदन के समय इस आदेश को परखा गया। जिससे पाली विकास खंड के विद्यालयों में अतिथि शिक्षकों की भर्ती में व्यापक रूप से मनमानी की बात सामने आयी है। जबकि उमरिया जिले के सीमावर्ती जिले और शहडोल संभाग के अन्य जिलों में आयुक्त के निर्देशों का बखूबी पालन हो चुका है। जिनमें डिण्डौरी, सिवनी, बालाघाट, शहडोल, अनूपपुर सहित प्रदेश के सभी आदिवासी जिलों में इस निर्देश का पालन करते हुए अंतिम वरीयता सूची के आधार पर अतिथि शिक्षकों को मैन्युअल अंक प्रदान किये गए हैं। लेकिन उमरिया जिले में आयुक्त के आदेश के बावजूद आज तक मैनुअल अंक नहीं जोड़े गए। नतीजा ये कि पिछले 4-5 साल से जनजातीय विभाग के स्कूलों में सेवाएं दे रहे अनुभवी अतिथि शिक्षक पोर्टल की गलती के कारण भर्ती से बाहर हो रहे हैं।

जब पूरे प्रदेश के आदिवासी जिले आयुक्त के आदेश को प्राथमिकता से लागू कर सकते हैं तो उमरिया में प्रशासनिक उदासीनता अतिथि शिक्षकों के भविष्य से खिलवाड़ करती नजर आ रही है जो सवालों के घेरे में है। 

शिक्षकों का आरोप है कि सरकार "जनजातीय गौरव" और "डिजिटल एमपी" की बात करती है, पर जमीनी हकीकत ये है कि एक जिले की लापरवाही से दर्जनों परिवारों की रोजी-रोटी पर संकट आ गया है। जिससे सरकार की म़ंशा और अमल करने वाले प्रशासनिक अधिकारियों के बीच का अंतर साफ नजर आ रहा है।



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