रिपोर्ट @शम्भूनाथ सोनी
उच्च न्यायालय के संज्ञान के बाद जांच की फाईल खुली
बिरसिंहपुर पाली --- उमरिया जिले के पाली थाना का बहु चर्चित राजेश प्रजापति गुमशुदगी की गुत्थी सुलझाने में पाली पुलिस घटना के चार वर्षों बाद भी अनसुलझा पडा हुआ है। यद्यपि इस गुत्थी को उलझाने में तत्कालीन पुलिस के जांच अधिकारियों की भूमिका को ही माना जाता है। यह मामला राजेश गुमशुदगी के साथ ही लगभग बारह लाख रूपये हडपने से जुडा हुआ है, तभी तो इस मामले में तत्कालीन पुलिस के जांच अधिकारियों ने भी उसी धन राशि में से हाथ साफ करने की बात तब भी और अब भी चर्चाओं में बना हुआ है।। अब मामला उच्च न्यायालय में रिट पिटीशन के माध्यम से जांच की फाईल खुल गई है, और माननीय न्यायालय ने गृह सचिव और पुलिस महानिदेशक से लापता राजेश को ढूढने का जिम्मा दिया है। जग जाहिर है कि उच्च न्यायालय में पिटीशन के साथ पाली पुलिस की परेशानी बढ गयी है और उसकों अपने पूर्व वती पुलिस अधिकारियों को बचाने का भी नैतिक दबाव और अपने को सुरक्षित रखने का दबाव बना हुआ है । इस मामले में नामजदगी खुलासा होने के बाद भी पाली पुलिस ने जिस तरह मामले में लीपापोती करते हुए आरोपियों को बचाया की वही लापरवाही अब पुलिस के गले की हार बन गयी है। बताया जाता है की इस मामले में लापता राजेश प्रजापति की माँ कपसी बाई ने जिस तरह से आप बीती पुलिस अधिकारियों को सुनाई, लिखित आवेदन पत्र प्रस्तुत कर अपने ठगी की कहानी सुनाई परन्तु पुलिस ने कुछ अंकित न करते हुए अंकित को अपनी ओर से आजाद पंक्षी बना कर खूब लुटने, चोरी करने का अवसर दिया। पाली पुलिस को यह भान ही नहीं रहा की इस मामले में फरियादिया अपने पुत्र के गायब होने और बारह लाख के लुट मामले को लेकर न्याय की आश मे उच्च न्यायालय की शरण ले सकती है। पाली पुलिस की जांच कार्यवाही पर उन दिनों भी सवाल के घेरे में थे, और आज भी गुनहगार के मकड़जाल में ऐसे फंसे हुए हैं की पुलिस किंकर्तव्यविमूढ़ बनी हुई है।अपराध जगत के नामी गिरामी अपराधी भी हर अपराध के साथ ऐसे साक्ष्य छोड़ जाते हैं की कर्तव्य परायण अन्वेषण अधिकारी गुनाह गार तक पहुँच जाते हैं, परन्तु इसके पीछे अपराधी को बचाने की हवस, और पैसों के लिए अंधी कमायी का जुनून का त्याग करना पड़ता है, जिसका की आज के जांच अधिकारियों में अकाल ही परिदृश्य हो रहा है। नहीं तो आरोपी के पास से लापता राजेश प्रजापति की सिम मिलना, फिर मोबाइल सेट मिलना, फरियादिया के बैंक खाते से लगातार राशि निकलवा कर क्रमशः हडपना, फरियादिया के व्दारा नाम जद शिकायत के बाद पुलिस की गलबहियां डालना आदि साक्ष्य एक दम साफ तस्वीर पेश कर रही है, फिर भी पुलिस का हाथ पर हाथ डालकर बैठे रहना, अपराधियों के लिए वरदान साबित हो रही है। अब मामला उच्च न्यायालय के निगरानी में जांच के दायरे में चल रहा है, अब ऊंट किस करवट बैठेगा यह तो आने वाला समय ही तय करेगा, लेकिन विधि विशेषज्ञों का मानना है कि अगर उच्च न्यायालय पुलिस की लीपापोती और अपराधी को बचाने के तथ्यों से संतुष्ट नहीं होगा तो इसकी बड़ी कीमत पुलिस को चुकानी पडेगी।


0 Comments