रिपोर्ट @मुर्तुजा अंसारी
*अमलाई कॉलोनी में पेयजल संकट से कर्मचारियों में आक्रोश, अधिकारी बोले "जानकारी नहीं थी", फोरमैन का दावा- "5 दिन पहले ही दे दी थी सूचना"; कर्मचारी कल्याण व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल*
अनूपपुर। देश को ऊर्जा देने वाली मिनिरत्न कंपनी की सहायक इकाई एसईसीएल के सोहागपुर एरिया अंतर्गत बंगवार उपक्षेत्र की अमलाई कॉलोनी इन दिनों गंभीर पेयजल संकट से जूझ रही है। पिछले सात दिनों से कॉलोनी में रहने वाले कर्मचारी और उनके परिवार पीने के पानी के लिए इधर-उधर भटकने को मजबूर हैं। जिस कंपनी की पहचान कर्मचारी कल्याण और बेहतर सुविधाओं के दावों से होती है, उसी कंपनी की कॉलोनी में मूलभूत सुविधा का अभाव अब कई सवाल खड़े कर रहा है।
कर्मचारियों का कहना है कि रोजमर्रा की जिंदगी पूरी तरह प्रभावित हो गई है। सुबह होते ही लोग बाल्टी, डिब्बे और अन्य बर्तन लेकर पानी की व्यवस्था में जुट जाते हैं। कई परिवारों को स्थानीय बोरवेल और अन्य वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। यदि यह व्यवस्था भी उपलब्ध न होती तो हालात और अधिक गंभीर हो सकते थे।
अधिकारी और फोरमैन के बयान में विरोधाभास
मामले ने उस समय नया मोड़ ले लिया जब जिम्मेदार अधिकारियों से संपर्क किया गया। संबंधित अधिकारी ने कहा कि उन्हें इस समस्या की जानकारी पहले नहीं थी और सूचना मिलते ही इंजीनियर को आवश्यक निर्देश दिए गए।
वहीं फिल्टर प्लांट के फोरमैन महेंद्र पाल ने दावा किया कि उन्होंने लगभग पांच दिन पहले ही अपने वरिष्ठ अधिकारी को समस्या से अवगत करा दिया था। उनके अनुसार मरम्मत के लिए आवश्यक मजदूर, संसाधन और सामग्री समय पर उपलब्ध नहीं कराई गई, जिसके कारण खराबी दूर नहीं हो सकी।
बताया जाता है कि दोनों पक्षों के बीच कॉन्फ्रेंस कॉल पर भी बातचीत हुई, लेकिन दोनों अपने-अपने दावों पर कायम रहे। अधिकारी का कहना था कि उन्हें केवल एक दिन पहले सूचना मिली, जबकि फोरमैन ने पूर्व में सूचना देने की बात दोहराई। इससे पूरे मामले में सूचना तंत्र और विभागीय समन्वय पर सवाल खड़े हो गए हैं।
समस्या तकनीकी या लापरवाही की?
यदि सूचना समय पर मिल गई थी तो सात दिनों तक मरम्मत क्यों नहीं हो सकी? यदि सूचना नहीं पहुंची तो विभागीय संचार व्यवस्था में चूक किस स्तर पर हुई? इन सवालों का जवाब अभी तक स्पष्ट नहीं हो सका है।
कर्मचारियों का कहना है कि पेयजल जैसी मूलभूत सुविधा में इतनी लंबी देरी केवल तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि जवाबदेही का विषय है। उनका आरोप है कि समय रहते कार्रवाई होती तो उन्हें इस परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता।
महाप्रबंधक कार्यालय तक पहुंचा मामला
जानकारी के अनुसार मामला महाप्रबंधक कार्यालय तक भी पहुंचा। वहां पदस्थ एपीएम ने पहले एरिया मैनेजर संजय सिंह से चर्चा करने की बात कही और बाद में संबंधित अधिकारियों से संपर्क कर समस्या के शीघ्र समाधान का आश्वासन दिया।
हालांकि समाचार लिखे जाने तक कॉलोनी में जलापूर्ति पूरी तरह सामान्य नहीं हो सकी थी और कई परिवार अब भी वैकल्पिक स्रोतों से पानी लेने को विवश थे।
करोड़ों के बजट के बावजूद मूलभूत सुविधा पर सवाल
कंपनी हर वर्ष कर्मचारी आवास, पेयजल, विद्युत, स्वच्छता, चिकित्सा तथा कॉलोनी रखरखाव पर करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा करती है। ऐसे में यह मामला कई अहम सवाल छोड़ता है—
यदि रखरखाव के लिए बजट उपलब्ध है तो सात दिन तक पेयजल व्यवस्था बाधित क्यों रही?
शिकायत मिलने के बाद तत्काल मरम्मत क्यों नहीं कराई गई?
आवश्यक संसाधन और मजदूर समय पर क्यों उपलब्ध नहीं कराए गए?
सूचना देने और कार्रवाई करने के बीच आखिर चूक किस स्तर पर हुई?
इस पूरे मामले की जवाबदेही किसकी तय होगी?
कर्मचारी कल्याण की असली परीक्षा
कोयला उत्पादन बढ़ाने के लिए कर्मचारियों से बेहतर प्रदर्शन की अपेक्षा की जाती है, लेकिन जब वही कर्मचारी अपने परिवार के लिए पीने के पानी की व्यवस्था करने में परेशान हों तो कर्मचारी कल्याण के दावे स्वतः सवालों के घेरे में आ जाते हैं।
अब कर्मचारियों की निगाहें कंपनी के महाप्रबंधक और क्षेत्रीय प्रबंधन पर टिकी हैं। उम्मीद की जा रही है कि केवल जलापूर्ति बहाल करने तक मामला सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह भी स्पष्ट किया जाएगा कि सात दिनों तक समस्या क्यों बनी रही, सूचना मिलने के बाद कार्रवाई में देरी क्यों हुई और यदि किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारों के विरुद्ध क्या कदम उठाए जाएंगे।


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