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कोतमा की सड़कों पर मौत का पहरा: आवारा पशुओं के आगे बेबस प्रशासन, क्या किसी बड़े हादसे का इंतज़ार?

 


रिपोर्ट @मिर्जा अफसार बेग
कोतमा। नगर की सबसे व्यस्त सड़क—ज्योति पेट्रोल पंप से बस स्टैंड तक—इन दिनों आवारा पशुओं का स्थायी ठिकाना बन चुकी है। सड़क के बीचों-बीच बैठे मवेशी और अचानक दौड़ पड़ने वाले पशु हर गुजरते वाहन चालक के लिए खतरे की घंटी बन चुके हैं। हैरानी की बात यह है कि रोजाना इस मार्ग से हजारों वाहन गुजरते हैं, बावजूद इसके जिम्मेदार प्रशासन की आंखें अब भी नहीं खुली हैं।

सुबह से देर रात तक इस मार्ग पर दोपहिया, चारपहिया, बसों और भारी वाहनों की लगातार आवाजाही रहती है। ऐसे में सड़क पर बैठे आवारा पशु किसी भी क्षण बड़े हादसे की वजह बन सकते हैं। कई बार वाहन चालक इन्हें बचाने के प्रयास में संतुलन खो बैठते हैं और दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि छोटी-छोटी दुर्घटनाएं अब आम बात हो गई हैं, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी मानो किसी बड़ी त्रासदी का इंतजार कर रहे हैं।

सबसे बड़ा सवाल नगर पालिका की कार्यप्रणाली पर खड़ा होता है। शहर की यातायात व्यवस्था और नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी जिस विभाग पर है, वही इस गंभीर समस्या पर मौन साधे हुए है। नागरिकों की शिकायतें, जनप्रतिनिधियों की मांगें और लगातार बढ़ता खतरा—सब कुछ होने के बावजूद आवारा पशुओं को सड़क से हटाने के लिए कोई प्रभावी अभियान नजर नहीं आ रहा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इन पशुओं को कांजी हाउस भेजने या उनके स्थायी प्रबंधन की व्यवस्था नहीं की गई, तो भविष्य में होने वाले किसी भी बड़े सड़क हादसे की जिम्मेदारी सीधे प्रशासन पर होगी। सवाल यह भी है कि जब नगर पालिका के पास पशुओं को पकड़ने और सुरक्षित स्थान पर भेजने का अधिकार है, तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?

कोतमा की जनता अब जवाब चाहती है। आखिर कब तक लोग अपनी जान जोखिम में डालकर इस सड़क से गुजरते रहेंगे? क्या प्रशासन किसी मासूम की मौत या बड़े हादसे के बाद ही जागेगा, या फिर समय रहते जिम्मेदारी निभाते हुए इस गंभीर समस्या का स्थायी समाधान करेगा?

अब देखना यह है कि नगर पालिका और जिला प्रशासन इस चेतावनी को गंभीरता से लेते हैं या फिर कोतमा की सड़कों पर मौत का यह खतरा यूं ही मंडराता रहेगा।


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