रिपोर्ट @शम्भूनाथ सोनी
बिना कलेक्टर अनुमति आदिवासी जमीनें सेठों के नाम, झुडपी जंगल और राजस्व सरकारी जमीन रजिस्ट्री प्रशासन मौन
बिरसिंहपुर-पाली में 1958-59 की खतौनी, 1975 के भू-अभिलेख गायब, राजस्व विभाग की मिलीभगत से हो रहे अवैध नामांतरण, पांचवी अनुसूची की उड़ रही धज्जियां
बिरसिंहपुर पाली - उमरिया जिला का क्षेत्र भारत सरकार के राजपत्र में अधिसूचित पांचवी अनुसूची का शेड्यूल ट्राइबल एरिया है। लेकिन यहां संविधान, सुप्रीम कोर्ट और मध्यप्रदेश लैंड रेवेन्यू कोड के सारे नियमों को ताक पर रखकर आदिवासियों की जमीनों की खुलेआम खरीद-फरोख्त चल रही है। बिना डीएम / कलेक्टर की अनुमति के, बिना 1958-59 की खतौनी और 1975 के भू-अभिलेख के परीक्षण के कई एकड़ जमीनों के नामांतरण कर दिए गए हैं बिरसिंहपुर क्षेत्र की झुडपी जंगल की जमीन से लेकर राजस्व विभाग की शासकीय जमीनों तक पर बड़े-बड़े सेठों ने बिल्डिंगें खड़ी कर दी हैं।
यह कोई छोटा-मोटा मामला नहीं, बल्कि संगठित भू-माफिया, रजिस्ट्री कार्यालय, पटवारी और तहसील स्तर के अमले की मिलीभगत से चल रहा हजारों करोड़ का जमीन घोटाला है।
1. अनुसूचित क्षेत्र में कानून क्या कहता है?
भारत के संविधान की पांचवी अनुसूची और मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 165(6) और धारा 170(ख) स्पष्ट कहती है -
1. अनुसूचित क्षेत्र में आदिवासी की जमीन गैर-आदिवासी नहीं खरीद सकता। 2. अगर खरीदना भी है तो कलेक्टर की लिखित पूर्व अनुमति अनिवार्य है, और वह भी तभी जब आदिवासी के पास 5 एकड़ से अधिक जमीन बची हो। 3. बिना अनुमति की गई हर रजिस्ट्री शून्य (Null and Void) मानी जाएगी और जमीन मूल आदिवासी को वापस होगी। 4. पेसा कानून (PESA Act 1996) के तहत ग्राम सभा की अनुमति के बिना भी किसी भी जमीन का हस्तांतरण अवैध है।
लेकिन बिरसिंहपुर पाली में इन सभी कानूनों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। सूत्रों के अनुसार यहां सामान्य सौदे के रूप में रजिस्ट्री की जा रही है, जैसे यह कोई सामान्य क्षेत्र हो।
2. 58-59 की खतौनी और 75 के अभिलेख गायब - खेल यहीं से शुरू
किसी भी जमीन के असली मालिक की पहचान के लिए 1958-59 की मूल खतौनी और 1975 का भू-अभिलेख सबसे बड़ा आधार होता है। 1980 तक कई खसरा नंबर आदिवासी समुदाय के नाम पर दर्ज थे।
सूत्रों से मिली जानकारी में सामने आया है कि अब कई खसरा नंबरों में 58-59 का उल्लेख ही नहीं है। पुराने रिकॉर्ड को दबाकर या गायब कर नए नामांतरण कर दिए गए हैं। सवाल उठता है कि यदि जमीन 1975 के रिकॉर्ड में आदिवासी के नाम थी, तो वह बिना कलेक्टर अनुमति के सामान्य वर्ग के व्यक्ति के नाम कैसे चढ़ गई? किस अधिनियम के तहत यह हुआ? रजिस्ट्री कार्यालय के पास इसका कोई जवाब नहीं है।
3. पाली क्षेत्र का झुडपी जंगल भी नहीं बचा
सबसे बड़ा खुलासा गिंजरी क्षेत्र में हुआ है। यहां की जमीन राजस्व रिकॉर्ड में झुडपी जंगल, छोटा झाड़ का जंगल और शासकीय भूमि के रूप में दर्ज है। वन और राजस्व दोनों के नियमों के अनुसार ऐसी जमीन का नामांतरण किसी भी निजी व्यक्ति के नाम पर हो ही नहीं सकता।
इसके बावजूद गिंजरी में दर्जनों लोगों के नाम पर पट्टे और नामांतरण चढ़े हुए हैं। मौके पर पक्की बिल्डिंगें, दुकानें और बाउंड्री वॉल बन चुकी हैं। यह सीधे तौर पर वन संरक्षण अधिनियम और भू-राजस्व संहिता का उल्लंघन है।
4. शासकीय जमीन पर भी बिल्डिंगें
बिरसिंहपुर पाली नगर के भीतर कई ऐसी जमीनें हैं जो नजूल या राजस्व विभाग की हैं, लेकिन वहां निजी व्यक्तियों ने मल्टी-स्टोरी बिल्डिंगें बना ली हैं। न तो नगर परिषद की अनुमति ली गई, न ही लैंड डायवर्सन हुआ। राजस्व विभाग के नक्शे में वह आज भी सरकारी जमीन है, पर मौके पर कब्जा किसी सेठ का है।
5. प्रशासन की भूमिका पर सवाल - सब मौन
हैरानी की बात है कि इतने बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध कारोबार पर जिला प्रशासन ने आंखें बंद कर रखी हैं।
रजिस्ट्रार ऑफिस: बिना कलेक्टर अनुमति और बिना 59-75 के रिकॉर्ड देखे धड़ल्ले से रजिस्ट्री कर रहा है। शेड्यूल एरिया की जांच की जिम्मेदारी सब-रजिस्ट्रार की है, लेकिन यहां हर रजिस्ट्री को सामान्य बताकर पास कर दिया जाता है।
पटवारी-तहसीलदार: रजिस्ट्री के बाद नामांतरण की अंतिम कड़ी यही है। बिना पंचनामा, बिना ग्राम सभा, बिना अभिलेख मिलान के नामांतरण स्वीकृत हो रहे हैं।
कलेक्टर कार्यालय: जिले के मुखिया को इस पूरे खेल की जानकारी होने के बावजूद धारा 170(ख) के तहत कोई भी जमीन वापस आदिवासियों को नहीं दिलाई गई है। आदिवासी समाज के लोगों द्वारा कई बार शिकायत करने के बाद भी जांच समिति तक नहीं बनी।
आदिवासी समाज में आक्रोश
स्थानीय आदिवासी संगठनों का कहना है कि यह जल, जंगल और जमीन पर सीधा हमला है। पाली शेड्यूल क्षेत्र होने के बावजूद यहां आदिवासी धीरे-धीरे भूमिहीन होते जा रहे हैं। जो जमीन उनके पुरखों की थी, आज उस पर बड़े-बड़े शोरूम और मकान बने हैं।
ग्रामीणों ने मांग की है कि -
1. पूरे बिरसिंहपुर पाली और गिंजरी क्षेत्र की जमीनों की पिछले 20 साल की रजिस्ट्री और नामांतरण की जांच के लिए उच्च स्तरीय एसआईटी बने। 2. 1958-59 की खतौनी और 1975 से 2025 तक के पूरे डिजिटल और मैनुअल रिकॉर्ड का मिलान किया जाए। 3. झुडपी जंगल और शासकीय जमीन पर हुए सभी नामांतरण निरस्त कर अतिक्रमण हटाया जाए। 4. धारा 170(ख) के तहत बिना अनुमति बिकी हर आदिवासी जमीन को मूल आदिवासी परिवार को वापस किया जाए। 5. दोषी पटवारी, तहसीलदार और रजिस्ट्री अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज हो।
यह मामला सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि संविधान द्वारा आदिवासियों को दिए गए संरक्षण का है। अगर समय रहते शासन नहीं जागा तो बिरसिंहपुर पाली में आदिवासी अपने ही शेड्यूल क्षेत्र में अल्पसंख्यक और भूमिहीन बन जाएंगे। अब देखना यह है कि खबर प्रकाशन के बाद जिला कलेक्टर उमरिया और संभागायुक्त शहडोल इस पर संज्ञान लेते हैं या फिर यह फाइल भी अन्य शिकायतों की तरह धूल खाती रहेगी।



0 Comments